शनिवार, 5 अप्रैल 2008

परिसीमन का साया : बिलबिलाते नेता, खिलखिलाती जनता और चोर लुटेरों की पौ बारह

परिसीमन का साया : बिलबिलाते नेता, खिलखिलाती जनता और चोर लुटेरों की पौ बारह

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

करवट 4 श्रंखलाबद्ध आलेख

पिछले अंक से जारी ...

यूं तो यह हर चुनाव के पहले ही होता है, लेकिन अबकी बार कुछ खास इसलिये है कि नये परिसीमन की छांव तले कुछ नये राजनीतिक ठीये बनेंगें, कुछ टूटेंगें । राजनेताओं और राजनीतिक दलों के बीच मारामार चालू हो गयी है ,जो कुछ वक्‍त पहले तक अन्‍दरूनी थी अब लगभग खुलकर सामने आ गयी है ।

कुछ राजनीतिक दलों ने तो अपने प्रत्‍याशीयों के नामों की विधिवत अखबारों में खबर छपवाकर घोषणा कर दी है । बहुजन समाज पार्टी के मुरैना जिला में 4 और म.प्र. में 64 प्रत्‍याशी घोषित हो चुके हैं, बसपा सुप्रीमो की नजर में हैं या नहीं लेकिन अखबारों में घोषित हो चुके हैं । इस प्रकार की अति पूर्व घोषणा के दूरगामी व असल परिणाम क्‍या होंगें ये वक्‍त बतायेगा 1 लेकिन घोषित प्रत्‍याशी अपने चुनाव प्रचार में या युद्धाभ्‍यास में जुट गये हैं इसमें संशय नहीं, मुरैना शहर के बदले हालात तो लगभग यही कहते हैं ।

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी जो कि पिछले नवम्‍बर के महीने से अपने राजनीतिक होमवर्क में जुटी थी, जनवरी के महीने से ही जमीनी कार्य करना चालू कर चुकी थी और मार्च तक नये परिसीमन के फॉर्म में आते ही अपनी कार्यवाही की गति काफी तेज कर दी है ।

कम से कम यह दाद तो देनी ही पड़ेगी कि भारतीय जनता पार्टी का आंतरिक एवं जमीनी नेटवर्क न केवल बहुत सशक्‍त व सक्रिय है बल्कि चार साल लगभग अदृश्‍य रहने के बाद अचानक पिगत तीन माह के भीतर ही अपनी सारी मशीनरी की न केवल ओवरहालिंग कर डाली बल्कि उसे तुरन्‍त त्‍वरित व सक्रिय भी कर दिया । इतनी फटाफट आटो मशीन शायद राजनीतिक तौर पर मैंने कभी नहीं देखी ।

भाजपा का राजनैतिक मार्केटिंग का फार्मूला का बेसिक कन्‍सेप्‍ट तो वही पुराना है लेकिन जिस नये तरीके से इसे अबकी बार प्रस्‍तुत किया जा रहा है, यदि चुनाव तक इस सामूहिक सम्‍मोहन को भाजपा कायम रख पाने में कामयाब होती है, तो शायद चुनावी परिणाम एकदम अनुमान के विपरीत होंगें । म.प्र. के हर आदमी को जिस जादू के साथ बिजी और मगन (सम्‍मोहित) कर दिया गया है, यह आश्‍चर्यजनक है । कुल मिला कर संक्षेप में कहें तो इतना पर्याप्‍त होगा कि ''इतिहास लिखे नहीं बनाये जाते हैं''

प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की हालत इस समय सबसे ज्‍यादा खराब है, वह अभी तैयारीयों की रणनीति ही बनाने की सोच रही है, जबकि उसकी प्रमुख विरोधी पार्टी अब तक अपनी योजनाओं व कार्यक्रमों को न केवल प्रारंभ कर चुकी है अपितु मूर्त रूप दे चुकी है । दो माह पहले तक जो स्‍वत: प्रदेश सरकार के बदले जाने के आसार बन रहे थे, लगता है कि हवा का रूख पलटा खा गया है । एक तो कांग्रेस की ढुलमुल व लगभग निष्क्रिय जैसी स्थिति, दूसरे करिश्‍माई नेताओं को पीछे धकेल कर नेपथ्‍य में पहुँचाना, तीसरे प्रदेश पदाधिकारीयों को नई बोतल में पुरानी शराब की तरह ठूंसना और चौथे नये पदाधिकारी (नये चेहरे) वही लोग हैं, जो पहले से ही चर्चाओं के केन्‍द्र रहे हैं, और खुद के बलबूते पर या पदीय बलबूतों के आधार पर अपना नाम चमका कर आगे आये हैं, पांचवा अन्‍य जो महत्‍वपूर्ण कारण है वह कांग्रेस के पास सैनिकों का अभाव है और उसका हर कार्यकर्ता सेनापति की भूमिका में नजर आता है । कांग्रेस को जब तक यह समझ में आयेगा कि चुनावी समर सैनिकों के सहारे लड़े जाते हैं न कि सेनापतियों के सहारे तब तक शायद काफी देर हो चुकी होगी ।

जहॉं अभी तक कांगेस न अपनी रणनीति साफ कर पायी है वही उसके प्रत्‍याशी कौन होंगें यह भी असमंजस की स्थिति है । अब किस विधानसभा की तैयारी कौन करे यह प्रश्‍न अधर में है । अक्‍सर होता यह है कि निर्वाचन नामांकन जमा करने की तिथि गुजर जाने के बाद कांग्रेस अपने प्रत्‍याशी घोषित करती है, तब तक कांगेस के नाम पर दस बीस लोग अपना एक ही सीट के लिये फार्म भर चुके होते हैं, और बाद में नाम घोषित हो जाने के बाद बकाया लोग अपना फार्म वापस ले लेते हैं, अब वे इसे हाईकमान का आदेश कह कर हवा में भले ही उड़ायें लेकिन जो चार छ दिन रात को सपने में विधायकी के जलवों का आनन्‍द लेते हैं वह कसक उन्‍हें अपनी ही पार्टी के प्रत्‍याशी के अन्‍दरूनी विरोध के लिये मजबूर कर देती है, और वे ऐसा करते हैं, दूसरे उनके ही घोषित प्रत्‍याशी को न तो चुनाव की तैयारी के लिये और न प्रचार के लिये ही समुचित वक्‍त मिल पाता है, एवं न मतदाता ही योग्‍य अयोग्‍य उचित अनुचित प्रत्‍याशी की परख पहचान ही कर पाता है, चुनावी शोर व ग्‍लेमर के बीच सब दब जाता है, जिसका खामियाजा कांग्रेस लम्‍बे समय से उठाती आ रही है ।

कांग्रेस को अपनी पार्टी में असमाजिक व बदनाम तत्‍वों को संरक्षण्‍ा व आश्रय देने से भी छुटकारा पाना होगा । हॉं यह ठीक है कि चुनावी नैया बगैर गुण्‍डों और लुटेरो के पार नहीं होती और इसलिये भले व शरीफ राजनीति में या तो प्रवेश ही नहीं कर पाते और यदि कर भी जायें तो जीत नहीं पाते । मैं समझता हूँ इस समय कांग्रेस का नेतृत्‍व ऐसे हाथों में हैं जो इस अवधारणा को बदलने की ताकत व तासीर रखता है, उसे किंचित प्रयास अवश्‍य करना चाहिये ।

मुरैना विधानसभा से अभी मात्र भाजपा और बसपा के उम्‍मीदवार ही लगभग घोषित से हैं, अन्‍य दलों ने अभी मौनव्रत साध रखा है, इन दो उम्‍मीदवारों के नाम पर तो जनता लगभग फैसला कर ही चुकी है कि क्‍या करना है और अब यह चर्चा आम भी हो चुकी है, अब अन्‍य दलों से नाम खुलें तो परिणाम पहले ही तय हो जायेगा कि क्‍या होगा ।                       

क्रमश: जारी अगले अंक में .........

 

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