सोमवार, 20 जुलाई 2009

भौगोलिक संकेत - किसानों तथा हस्तशिल्पकारों के लिए रास्ता

भौगोलिक संकेत - किसानों तथा हस्तशिल्पकारों के लिए रास्ता

 

राजीव जैन, निदेशक (मीडिया एवं संचार), पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली

भारत की विशाल जैव-विविधता तथा कृषि जलवायु स्थितियों ने विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में कृषि उत्पादों की अनेक किस्मों तथा स्थानीय संसाधनों एवं कौशल के अनोखेपन के लिए मंच तैयार किया है। भारतीय किसान तथा ग्रामीण शिल्पकारों को वस्त्र, हस्तशिल्प तथा अन्य पारंपरिक उत्पादों जैसे बनारसी साड़ी और मुजपऊफरपुर की लीचियों के उत्पादन में विशेषज्ञता हासिल है । अब चिन्ता का विषय यह है कि इन उत्पादों के उत्पादकों को अन्य क्षेत्रों व दूसरे देशों के मुकाबले उनके अनूठे उत्पादों का वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता है । परिणामस्वरूप वास्तविक किसान अपने अनूठे उत्पाद के वाणिज्यिक लाभ से वंचित हो जाता है ।

       उत्पादों के अनूठेपन में और वृध्दि करने का एक प्रभावी रास्ता भौगोलिक संकेत (जीआई) प्राप्त करना है, जो कि एक बौध्दिक संपदा अधिकार है । जीआई किसी विशेष क्षेत्र में उत्पन्न उत्पाद की पहचान करता है । भौगोलिक उत्पत्ति के लिए गुणवत्ता, धारणा, छवि या अन्य लक्षण इस उत्पाद के अनिवार्य गुण होंगे । एक जीआई को उत्पाद के भौगोलिक मूल उद्गम को सूचित करने में सक्षम होना चाहिए,  जैसे प्रत्यक्ष रूप से दार्जिलिंग और अप्रत्यक्ष रूप से बासमती ।

       अन्य बौध्दिक संपदा अधिकारों की अपेक्षा, भौगोलिक संकेत (जीआई) उत्पादों के उत्पादकोंशिल्पकारों द्वारा स्थापित विधिक संगठन की संपदा है । अन्य क्षेत्रों में जो उत्पादक समान वस्तुओं का उत्पादन करते हैं उन्हें जीआई के उपयोग से अलग रखा जाना चाहिए ताकि वे उत्पादक जीआई के तहत संरक्षित उत्पादों की खूबी का अवैध रूप से फायदा न उठा सकें ।

       जीआई उत्पादों के अनूठेपन तथा उनकी गुणवत्ता के प्रति भी आश्वस्त करता है जिसके लिए उपभोक्ता तथा व्यापारी सामान्यतया भुगतान करते हैं । इसलिए जीआई अनूठे उत्पादों के उत्पादन में लगे उत्पादकों तथा शिल्पकारों की आय में वृध्दि कर सकता है ।

       यद्यपि भारत ने वस्तुओं के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999 को लागू कर दिया है लेकिन सामान्यत: गरीब किसान तथा शिल्पकार जीआई के लाभों के बारे में नहीं जानते और न ही उत्पादक अपने उत्पादों के लिए जीआई पंजीकरण संख्या ही लेते हैं । अनूठे भौगोलिक उत्पादों के संरक्षण के लिए जीआई सुरक्षा के अभाव में उत्पादक तथा शिल्पकार अन्य क्षेत्रों में उनके अनोखे उत्पादों की छवि का मुक्त रूप से लाभ उठाने से रोकने के लिए कानूनी उपाय करने में अक्षम होते हैं । अधिकतर मामलों में ये लोग जीआई के लिए आवेदन पत्र भरने के लिए आवश्यक कानूनी कार्रवाई पूरा करने में अक्षम होते हैं ।

       भारत में जीआई पंजीकरण के लिए उपयुक्त उत्पादों के अधिकतर उत्पादक ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं जो कम शिक्षित और समाज के गरीब तबके से संबंध रखते हैं । उनके पास संसाधनों तथा क्षमताओं की कमी होती है । वे नहीं जानते कि कैसे जीआई पंजीकरण के लिए उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति के आवश्यक गुणों का दस्तावेजीकरण किया जाए जो कि पंजीकरण के लिए मूलभूत अनिवार्यता है ।

       गरीब किसानों को छोड़ दें तो यह बेहद ही असामान्य बात है कि सक्षम जीआई उत्पादों के उत्पादक वस्तुओं के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण तथा संरक्षण) अधिनियम, 1999 से लाभ उठाने में सक्षम होंगे । इसके परिणामस्वरूप हो सकता है कि वे उच्च आय प्राप्त करने के लिए अपने उत्पादों की वाणिज्यिक वृध्दि के अवसर ही गंवा दें । गरीब उत्पादकों तथा शिल्पकारों के समुदाय द्वारा अपने अनूठे उत्पादों के लिए जीआई सुरक्षा प्राप्त करने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग से जीआई जागरूकता के लिए अनेक उपाय लागू किए हैं ।

       सरकार के हस्तक्षेपों के परिणामस्वरूप उत्पादकों तथा शिल्पकारों ने कुछ उत्पादों जैसे बनारसी साड़ी, उड़ीसा की पिपली एपलीक हथकरघा वस्तुएं तथा लखनऊ की चिकनकारी के लिए जीआई पंजीकरण के लिए आवेदन पत्र जमा कराए हैं । मुजपऊफरपुर की शाही लीची और भागलपुर सिल्क के कपड़ों के जीआई पंजीकरण के लिए भी कार्य आरंभ कर दिया गया है ।

       जीआई पंजीकरण के लाभों, विधिक पहलुओं तथा उत्पादनों के पंजीकरण तथा ब्राण्ड तैयार करने के लिए जीआई का उपयोग तथा इससे प्राप्त वाणिज्यिक लाभ के बारे में राज्य सरकार तथा अन्य हितधारकों के लिए एक जन चेतना अभियान की तत्काल जरूरत है । इसके लिए सरकारी अधिकारियों, कानूनी विशेषज्ञों तथा उत्पादकों को निकट लाने तथा इनके बीच संपर्क स्थापित करने की सख्त जरूरत है जिसके बिना हम सब नुकसान उठाते हैं ।

       उपर्युक्त चुनौतियों तथा अन्य चुनौतियों से निपटने के लिए उचित रणनीतियां जीआई में मौजूद वाणिज्यिक तथा आर्थिक क्षमता के दोहन में मील का पत्थर साबित हो सकती है । मध्यम तथा दीर्घ अवधि के लिए एक सतर्क एवं योजनाबध्द रणनीति की तत्काल जरूरत है ।  

 

एक कुँये ने दिहाड़ी मजदूर को बना दिया लखपति

एक कुँये ने दिहाड़ी मजदूर को बना दिया लखपति

आलेख- जे. पी. धौलपुरिया, उप संचालक, जिला जन सम्पर्क कार्यालय, शहडोल म. प्र.

शहडोल / एक पिछड़े इलाके में बगैर सिंचाई साधन के वित्ताभर खेती करने वाले श्री खोजराम सिंह के भविष्य के बारे में यही कल्पना की जा सकती थी कि वह इन्द्रदेव के प्रसन्न होने पर अनाज के कुछ दाने पैदा करके और दूसरों के खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करके गरीबी में ही जीवन बिताएगा। लेकिन खुद खोजराम के इरादे कुछ और ही थे । शासन की कपिलधारा योजना के तहत उन्होंने अपने खेतों में कुआ न खुदवाया होता, तो उनकी जिन्दगी में यह मोड़ नहीं आता । आज श्री खोजराम सिंह एक लखपति किसान हैं । सरकारी योजनाओं की मदद और अपनी मेहनत से सम्पन्न हुए किसानों पर लिखी सफलताओं की गाथाओं में से एक उनकी भी है ।

       शहडोल जिला मुख्यालय से 35 कि.मी. के अन्तर पर स्थित एक छोटे से गांव चटहा के रहनेवाले श्री खोजराम सिंह कहने को तो साढ़े तीन एकड़ जमीन के स्वामी थे, लेकिन उनके खेतों की प्यास बझाने को उनके पास सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं थी । हकीकत में वह दिहाड़ी मजदूर थे और दूसरों के खेतों में काम करके किसी तरह अपनी आजीविका चला रहे थे।

       तभी ग्रामीण विकास विभाग ने वर्ष 2007 में उन्हें अपने खेतों में कुआ खोदने के लिए कपिलधारा के तहत 67 हजार रूपये की आर्थिक मदद दी । कुए के भरोसे उन्होंने बैंक से लोन लेकर मोटर पंप भी लगवा लिया । इस कुए ने श्री खोजराम सिंह का जीवन ही बदल दिया । कुए की मदद से पहले साल ही ली गई फसल ने उनको लखपति बना दिया । उन्होंने धान, प्याज, बेगन, टमाटर, गेहूँ की भरपूर फसल ले डाली । अकेले प्याज की विक्री से ही उन्हें एक लाख रूपये की आमदनी हुई।  बेगन और टमाटर भी हजारों रूपये के बिके और अभी उनके खेतों से रोजाना 50 किलो बेगन निकल रहा है। उनके खेतों से करीब साठ हजार रूपये की लौकी का उत्पादन होने का अनुमान है। कभी जो हाथ काम मांगने को उठते थे, वही आज दूसरों को काम दे रहे हैं । श्री खोजराम सिंह कुआ पाकर इतने उत्साहित हैं कि चहकते हुए बघेली में बताते हैं, '' हमार हाल वहै हवै जइसन कि कउनै भूखे आदमी का खाइ का मिल गा होय'' । खोजराम आज खेतों के जरिए अपने परिवार के सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुनने में जुटे हैं । खास बात यह है कि खोजराम ने इतने अल्प समय में ही अपनी फसलों की कमाई से अपना पुराना कर्ज पटा दिया और आलीशान मकान बनवाना शुरूकर दिया है । दो कमरे वह पहले ही बनवा चुके थे । एक दो पहिया वाहन भी खरीद लिया है, जिस पर उनका पुत्र सब्जी लादकर शहडोल मंडी ले जाता है । इसी से उनके दो पुत्रों ने मोबाइल खरीद लिए हैं । जिनसे वे आड़तियों से सब्जियों के भाव पता करते रहते हैं । सब्जी के बढ़ते उत्पादन को देखते हुए उन्होंने एक पिकअप वाहन खरीदने की योजना भी बनाई है । आज श्री खोजराम सिंह की बड़े सब्जी उत्पादकों में गिनती होती है।

       लेकिन श्री खोजराम के लिए यह सब इतना आसान नहीं था । इसमें उनके और उनके परिबार की कड़ी मेहनत भी शामिल है । श्री खोजराम की पत्नी श्रीमती मुन्नीबाई अपनी पुरानी जिन्दगी को याद करके कहती हैं, '' पहिले हम अउर हमार परिवार एक-एक पइसा का तरसत रहा है । आज हमरे नेरे चौबीसों घण्टा पइसा रहा आबत है। पहिले पइसा केर काम पड़ जात रहा है ता दूसरेन से कर्जा लेय का पड़त रहा है। आज हम खुद वक्त जरूरत मां दूसरेन का कर्जा देइत हयन '' ।

       कपिलधारा ने उन अनेक लोगों का जीवन बदला है, जो अपनी जमीन पर फसल उगाने और उसे बेचने के सिवा कुछ और करने की सोच भी नहीं सकते थे । लेकिन सिंचाई संसाधन के अभाव ने उन्हें विवश कर रखा था । इन्हीं में से एक हैं चटहा के तीन एकड़ भूमि के स्वामी श्री उदयभान सिंह । कपिलधारा के एक कुए ने न केवल उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया, बल्कि उनका जीवन ही बदल दिया । पहले साल ही उन्होंने फसल की विक्री से एक लाख रूपये की कमाई की ।  उन्होंने भी अपना पुराना कर्ज अदा कर दिया । वह प्याज के बड़े उत्पादक माने जाते हैं । आज उनके गोदाम में कई क्विंटल प्याज भरा पड़ा है ।

 

आटोरिक्शा ने खोला प्रकाश के जीवन की तरक्की का नया अध्याय

आटोरिक्शा ने खोला प्रकाश के जीवन की तरक्की का नया अध्याय

आलेख- जे. पी. धौलपुरिया, उप संचालक, जिला जन सम्पर्क कार्यालय, शहडोल म. प्र.

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शहडोल/ आर्थिक अभावों और नौकरी न मिल पाने से निराश रहे, लेकिन काम के लिए अपना जुनून बरकरार रखते हुए सरकार की मदद से मिले आटोरिक्शा से अपने जीवन को व्यवस्थित रूप से पटरी पर लाने वाले प्रकाश चौधरी को आज इस बात का कोई मलाल नहीं है कि उनको एक सरकारी नौकरी नहीं मिली । आटोरिक्शा चलाने का उनका कामआज एक फलते-फूलते कारोबार में तब्दील हो गया है ।

       नौजवान प्रकाश की पृष्ठभूमि शहडोल नगर के घरौला मोहल्ले और उनके शुरूआती जीवन को देख कोई नहीं कह सकता था कि वे कभी सफल होंगे । बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले प्रकाश एक मेहनतकश परिवार से जुड़े हुए हैं । हाई स्कूल की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने नौकरी के लिए बहुत हाथ-पैर मारे, लेकिन सफलता नहीं मिली । अलबत्ता जिला अन्त्यावसायी सहकारी समिति ने शासन की पवन पुत्र योजना के अन्तर्गत प्रकाश को एक आटोरिक्शा उपलब्ध कराया, जिसमें अनुदान भी शामिल था । अच्छी जिन्दगी जीने की तमन्ना लेकर आटोरिक्शा से जीवन का तानाबाना बुनना शुरू करने बाले प्रकाश के जीवन में सफलता के बीज बोए जा चुके थे और उनका आटोरिक्शा का काम मजबूती से बढ़ने लगा और आज प्रकाश आटोरिक्शा संचालन बाजार में श्रेष्ठ आटोरिक्शा चालकों में एक हैं ।

       एक निर्धन मजदूर परिवार में जन्में प्रकाश ने कभी सपने में भी न सोचा था कि एक दिन वे एक सफल व्यवसायी बन जाएंगे । लेकिन इस शांत और व्यवहार कुशल लड़के ने जो एक बार शुरूआत की, तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा । कौन सोच सकता है कि हाई स्कूल तक पढ़ा यह नौजवान सवारियों को अपने आटोरिक्शा में सफर करने के लिए बहलाकर अपना जीवनयापन करता है ? मानवीय व्यवहार को समझने और विपणन कौशल को मांजने के लिए यह मायने रखनेवाला अनुभव है । यहीं से उन्होंने प्रतिष्ठित नागरिकों और अन्य पेशेवरों के साथ बेहतरीन संबंध स्थापित कर लिए, जो आटोरिक्शा की आवश्यकता होने पर आज भी उन्हीं को याद करते हैं।

       खास बात यह है कि प्रकाश अपने ग्राहकों को स्थापित अन्य आटोरिक्शा चालकों की अपेक्षा बाजिव कीमत पर अपने आटोरिक्शा की सेवाएं मुहैया कराते हैं । अपने कारोबार को चमकाने के लिए वह अपने खास ग्राहकों को मोबाइल पर भी अपनी सेवाएं देते हैं । अपने कारोबार की आमदनी का कुछ हिस्सा वह मोबाइल के माध्यम से आटोरिक्शा सेवा उपलब्ध कराकर अर्जित करते हैं । इसके लिए उन्होंने अपने खास ग्राहकों को अपने मोबाइल का नम्बर दे रखा है । वह मोबाइल पर आर्डर बुक करते हैं और जब भी उनके मोबाइल पर किसी का संदेश आता है, तो वह फौरन अपना आटोरिक्शा लेकर उसके पास हाजिर हो जाते हैं ।

       सफलता के मुकाम तक पहुंचने की उनकी कहानी इस बात की गवाह है कि सरकारी मदद के साथ-साथ दृढ़ निश्चय, कड़ी मेहनत, व्यवहार कुशलता व्यवसाय मामले में पेशेवर दक्षता से क्या नहीं हासिल किया जा सकता । प्रकाश याद करते हैं, '' पहले पैसे को तरसना पड़ता था । अब खुद की गांठ में चार पैसे हो गए हैं ।'' प्रकाश ने आटोरिक्शा संचालन कारोबार की बारीकियां सीख ली थीं । इससे उन्हें अपनी कमाई बढ़ाने में मदद मिली । आज आटोरिक्शा संचालन के मामले में शहडोल नगर में प्रकाश चौधरी एकदम जाना-पहचाना नाम है, जिसकी बदौलत उनकी आमदनी में इजाफा हो गया है ।

       बदलते रूझान से तालमेल बिठाते हुए प्रकाश ने त्वरित आटोरिक्शा सेवाएं देने के मकसद से न केवल मोबाइल सेवा को आजमाया, बल्कि उनके लिए उनके ग्राहक भगवान से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं । आटोरिक्शा संचालन का यह मेहनतकश कहता है, '' ग्राहक भगवान तुल्य होते हैं, इसलिए उनके साथ सदा अच्छा बर्ताव करना चाहिए । '' आज यही आटोरिक्शा उनके परिवार की आजीविका का सहारा बना हुआ है ।

 

गांव की गलियों में अब बस बायोगैस चूल्हों की गूंज

गांव की गलियों में अब बस बायोगैस चूल्हों की गूंज

आलेख- जे. पी. धौलपुरिया, उप संचालक, जिला जन सम्पर्क कार्यालय, शहडोल म. प्र.

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शहडोल / आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले के कई गांवों में ग्रामीण महिलाओं को जैसे अब लकड़ियों के चूल्हों पर भोजन बनाना रास नहीं आ रहा है । गांव के रसोईघरों में अब इनकी जगह बायोगैस चूल्हा लेने लगे हैं । बायोगैस चूल्हों की खूबियों के कारण ग्रामीण महिलाओं का रूझान बड़ी तेजी से इनकी तरफ बढ़ रहा है ।

       आधुनिकता के इस दौर में लकड़ी ईंधन चूल्हों के स्थान पर बायोगैस से चलने वाले चूल्हों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के पीछे मध्य प्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना शहडोल का कम योगदान नहीं है ।  देश में घटते जंगलों की किल्लत को ध्यान में रखते हुए परियोजना ने शहडोल जिले के करीब 140 गांवों में जंगल को बचाने और भोजन बनाने में बायोगैस के प्रचलन को बढ़ाने के लिए लोगों में जागरूकता फैलाई, ताकि आनेवाले समय में लकड़ियों की समस्या को कुछ कम किया जा सके । अंदाजन एक परिवार द्वारा प्रतिदिन 10-12 कि.ग्रा. सूखी लकड़ियां ईंधन के  रूप में इस्तेमाल की जाती हैं और अकेला परिवार सालभर में लगभग 2.2 टन लकड़ियों का प्रयोग ईधन के  रूप में कर लेता है । अब अंदाजा लगाइए कि पूरा गांव सालभर में कितनी लकड़ियां जला लेता होगा ।

लिहाजा जिले के आदिवासी बाहुल्य गांव महरोई समेत कई गांवाें में जंगल बचाने और बायोगैस का इस्तेमाल बढ़ाने की मुहिम चलाई गई । नतीजतन गांवों में किसानों के घरों में बायोगैस संयंत्र आकार लेने लगे । महिलाओं को तो मानों बहुत बड़ा उपहार मिल गया हो। पहले लकड़ियों पर खाना बनाने से उठता तेज धुंआ फैंफड़ों में जाता था, जिससे वे फैंफड़ा जन्य बीमारियों से ग्रस्त हो जाया करती थीं । लकड़ियों के निकले धुंए से बर्तन काले हो जाते थे और भोजन बनाने में बक्त भी बहुत लगता था । बरसात में तो लकड़ियों में सीलन बैठने से और अधिक परेशानी हुआ करती थी । लेकिन महिलाओं को अब इन सारी परेशानियों से निजात मिल गई है।

       अकेले महरोई गांव में परियोजना के सहयोग से लकड़ियां चूल्हों की जगह तेजी से बायोगैस चूल्हे लेने लगे । इस गांव के करीब 28 घरों में बायोगैस चूल्हों पर खाना बनने लगा है। इससे गांव में प्रतिवर्ष 22400 रूपये मूल्य की 56 टन लकड़ियों की बचत हो रही है । परियोजना द्वारा इस वित्तीय वर्ष में कई गांवों में 560 बायोगैस संयंत्रों का निर्माण कराया जा चुका है तथा जुलाई 2009 तक 750 संयंत्रों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है । बायोगैस से बनाए जाने वाले भोजन के प्रति लोगों का बेतहाशा रूझान बढ़ा है । परिवर्तन की लहर के साथ ही बायोगैस संयंत्रो से निकलने वाला जैव खाद भी खेतों को मिलने लगा है । गांवों में बायोगैस संयत्रों की संख्या बढ़ने से बायोगैस से भोजन और चाय बनाने या दूध गर्म करने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ती गई है।  बायोगैस चूल्हें का इस्तेमाल इतना आसान है कि कम उम्र की लड़कियों को भी इसके इस्तेमाल में कोई परेशानी नहीं होती ।

       महरोई गांव में बायोगैस संयंत्रों की स्थापना के लिए सरकार ने हरसंभव इमदाद दी । बायोगैस का प्रचलन बढ़ाने के लिए सरकार की इस परियोजना ने अनुदान उपलब्ध कराकर गांव में बायोगैस संयंत्रों का जाल फैलाने की योजना बनाई । घरों में बायोगैस के चलन से रसोई घर के स्वरूप में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है तथा इसकी गूंज गावं की गलियों तक पहुंच चुकी हैं । बगैर खर्च में अधिक फायदेमंद होने के कारण इसको ग्रामीण्ा समाज से फौरन आत्मसात कर लिया । महिलाओं की प्रसन्नता का तो जैसे कोई अंदाजा ही नहीं है । बायोगैस के इस्तेमाल से अपनी दिनचर्या बदलने वाली प्रतिभा नट का कहना था कि बायोगैस ने जहां धुंए से निजात दिला दी और भोजन पकाने के समय में बचत कर दी, वहीं बायोगैस के अवशिष्ट यानि खाद ने उसकी फसल के उत्पादन को दो गुना तक बढ़ा दिया है । श्यामबाई बताती हैं कि बायोगैस से खाना बनाने की उनकी खुशी का ठिकाना नहीं है ।

 

किसानों ने नहर से बदली तकदीर

किसानों ने नहर से बदली तकदीर

आलेख- जे. पी. धौलपुरिया, उप संचालक, जिला जन सम्पर्क कार्यालय, शहडोल म. प्र.

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शहडोल/ काले सोने के प्रमुख उत्पादक के रूप में मशहूर शहडोल जिले के एक छोटे से आदिवासी बाहुल्य गांव महरोई ने अतीत में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं । लेकिन इसकी शक्लों-सूरत में जितना बदलाव पिछले एक वर्ष में दिखा है, पहले शायद ही दिखा हो । अपनी शांत वादियों, हरी-भरी नैसर्गिक छटाओं के बीच बसा यह गांव तब पानी से जूझता हुआ एक मामूली सा गांव हुआ करता था, पर नहर बनने के बाद इस गांव का चेहरा तो बदला ही, चरित्र भी बदल गया है । खेतों के लिए पानी का इंतजाम हो जाने के बाद वह नये सत्ता केन्द्र के रूप में उभरा है ।

       कभी महरोई पानी के लिए संघर्ष करते लोगों का गांव माना जाता था । वहां के खेतों को जैसे बरसात की नजर लग गई थी, तो उनके खेत अवर्षा की भेंट चढ़ गए । खेती सिमट गई थी। आखिरकार मध्य प्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना शहडोल के प्रतिनिधियों ने इस गांव का दौरा किया । प्रतिनिधियों ने गांव के पास एक पहाड़ी पर बने नैसर्गिक जल स्त्रोत को देखा, जिसका पानी गांव की ओर मुड़े महादेवन नाले में गिरता था । बस  फिर क्या था, प्रतिनिधियों ने किसानों को श्रमदान से गांव तक नहर बनाने के लिए प्रेरित किया, ताकि नाले के बेकार बहने वाले पानी को रोककर उसके जल का सालभर इस्तेमाल किया जा सके । किसानों ने श्रमदान करके नाले से गांव तक कच्ची नहर बना ली ।

कच्ची नहर से गांव तक पानी तो पहुंच गया, पर कच्ची मिट्टी से पानी रिस भी जाता था। किसानों के श्रमदान से मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत शहडोल श्री पी. के. श्रीवास्तव इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने राज्य सरकार की ओर से रोजगार गारन्टी योजना के तहत नाले से गांव तक पक्की नहर बनवाने 14.25 लाख रूपये की आर्थिक मदद उपलब्ध करा दी । इस तरह सरकार की मदद से वहां न केवल 1200 मीटर लम्बी पक्की नहर बना दी गई, बल्कि नहर के उद्गम स्थल पर नाले के जल को प्रवाहमान बनाने की व्यवस्था भी की गई, ताकि पानी वेग के साथ बहकर नहर के अंतिम छोर तक पहुंच सके । साल भर पहले पानी के लिए तरसने वाला महरोई गांव नहर बनने के बाद जिले में सबसे तेजी से फसलों का उत्पादन बढ़ाने वाले गांवों में शुमार हो गया है, जो यहां के गेहूं, चावल, सब्जियों के बढ़ते उत्पादन से साफ नजर आता है ।

कभी एक फसल को तरसने वाले और फांकाकशी तक करने वाले किसान आज दो से तीन फसलें ले रहे हैं । उनकी आमदनी बड़कर तीन गुना तक हो गई है । महरोई एक ऐसे विकसित गांव में तब्दील हो गया है, जिसमें परियोजना की मदद से नये केंचुआ खाद संयत्र और नये बायोगैस संयत्र उग आये हैं और समृध्दि में तेजी आ गई है । खेती-बाड़ी की बेहतरी और विभिन्न सरकारी योजनाओं के लागू होने से बड़ी मात्रा में रोजगार पैदा हुआ है। महिलाएं हर क्षेत्र में पुरूषों से टक्कर लेती दिखती हैं ।

       यह नहर का ही कमाल है कि मई में धान की फसल लेने का नया रेकार्ड बन रहा है । गांव के किसानों के खेतों की सिंचाई का रकबा बढ़कर 200 एकड़ हो गया है । ये नहर गांव के 200 परिवारों की जीवनदायिनी बन गई है । किसान मालामाल होने लगे हैं । गांव के कुओं और हैण्डपंपों का जल स्तर बढ़ गया है । अब भीषण गर्मी में भी पीने का पानी  आसानी से मिल जाता है । जबकि पहले गर्मी में पेयजल का संकट गहरा जाता था ।

महरोई की कृषि आधारित तरक्की के दो मुख्य कारण है - नहर के बन जाने से खेतों को जीवन मिलना और सरकार की ग्रामीण आजीविका परियोजना का लागू होना । इससे किसानों को कृषिजन्य सुविधाएं और रोजगार के अवसर मिलना शुरू हो गया । तभी यहां किसानों के आर्थिक और सामाजिक स्तर में उल्लेखनीय वृध्दि हुई । परियोजना के जिला परियोजना अधिकारी श्री धनन्जय वारलिंगे बताते हैं कि ग्रामीणों की आय वृध्दि और उनके विकास को ध्यान में रखकर विभिन्न गतिविधियों को लागू किया गया है।  महरोई में उपलब्ध नहर अैेर परियोजना की सुविधाएं यहां के कृषकों के भविष्य को संवारने में मील का पत्थर साबित होगी ।

 

रविवार, 19 जुलाई 2009

अधिकारी आमजन की समस्याओं का निराकरण तत्परता से करें - सामान्य प्रशासन राज्य मंत्री श्री अग्रवाल

अधिकारी आमजन की समस्याओं का निराकरण तत्परता से करें - सामान्य प्रशासन राज्य मंत्री श्री अग्रवाल

 

गुना में जनसुनवाई

 

Bhopal:Saturday, July 18, 2009

सामान्य प्रशासन, नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण एवं विमानन राज्यमंत्री श्री के.एल. अग्रवाल ने आज शनिवार को अपने गुना के प्रवास के दौरान जनसुनवाई की। इस अवसर पर शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के लोगों ने राज्यमंत्री को आवेदन देते हुये अपनी समस्याओ का निराकरण कराया। श्री अग्रवाल ने सभी आवेदको की समस्यायें सुनकर संबंधित अधिकारियों के माध्यम से निराकरण की कार्यवाही सुनिश्चित की।

राज्यमंत्री श्री अग्रवाल ने ग्रामीणों द्वारा बताई गई समस्याओं के सम्बंध में सम्बंधित विभागीय अधिकारियों को निराकरण के निर्देश दिये। श्री अग्रवाल ने कहा कि प्रदेश में मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने आमजन की समस्याओ के निराकरण के लिये जनसुनवाई कार्यक्रम शुरू किया हैं। प्रत्येक मंगलवार को जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित जिले के सभी कार्यालयों में अधिकारियों द्वारा जनता की सुनवाई कर उनकी समस्याओं का निराकरण किया जा रहा हैं।यह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया हैं,जिसमें सभी अधिकारी अपने अन्य शासकीय कार्य छोड़ कर जनता की समस्याओं का निराकरण करेंगे। जनसुनवाई कार्यक्रम चलाने के पीछे मुख्यमंत्री का यह उद्देश्य है कि प्रदेश की जनता के काम आसानी से हो सकें साथ ही उन्हें अपनी समस्याओं के लिये यहां वहां न भटकना पड़े। जिले के सभी अधिकारियों को राज्यमंत्री श्री अग्रवाल ने निर्देश दिये कि वे जनसुनवाई कार्यक्रम को पूरी गंभीरता से लें। कार्यक्रम के दौरान जो भी आवेदन प्राप्त हो उनका निराकरण तत्काल किया जाकर संबंधित को अवगत भी कराया जायें।

 

 

बालिकाओं के गणवेश के लिए पॉलीस्टर वस्त्र का इस्तेमाल नहीं होगा (बालिकाओं को नि:शुल्क गणवेश की योजना)

बालिकाओं के गणवेश के लिए पॉलीस्टर वस्त्र का इस्तेमाल नहीं होगा (बालिकाओं को नि:शुल्क गणवेश की योजना)

प्रत्येक विकासखंड न्यूनतम पांच वस्त्रों के नमूने की जांच करायेगा

Bhopal:Saturday, July 18, 2009

 

राज्य शासन ने सभी जिला कलेक्टरों और जिला परियोजना समन्वयकों को शासकीय शालाओं में कक्षा एक से आठवीं तक दर्ज समस्त बालिकाओं को आगामी 15 अगस्त तक नि:शुल्क गणवेश के वितरण के निर्देश दिये है। बालिकाओं को गुणवत्तायुक्त गणवेश ही प्रदाय करने को कहा गया है।

स्कूल शिक्षा मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनीस की पहल पर इस बार गणवेश वितरण हर हाल में निर्धारित समय-सीमा में गुणवत्ता का ध्यान रखते हुए किये जाने की व्यवस्था की गई है। इसके लिए विकास खण्ड स्तर पर गणवेश मेलों का भी आयोजन किया जायेगा। गणवेश की गुणवत्ता का ध्यान रखने के लिए समस्त जिलों को निर्देश जारी किये गये है। जिसके अनुसार किसी भी परिस्थिति में शत-प्रतिशत सिंथेटिक धागों#पॉलिस्टर धागों से निर्मित वस्त्र को गणवेश हेतु क्रय नहीं किये जाने को कहा है। क्योकि यह वस्त्र मानव त्वचा एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। ब्यूरों ऑफ इंडियन स्टेंडर्ड के द्वारा शालाओं में गणवेश के लिए पॉलिस्टर तथा कॉटन के ब्लेंडड कपड़े का उपयोग अनुशंसित किया गया है। ब्लेंडेड कपड़े में कॉटन की मात्रा जितनी अधिक होगी, उतना ही वह कपड़ा मानव त्वचा के लिए उपयुक्त होगा। शासन ने उपलब्ध बजट की सीमा में ऐसे ब्लेंडेड कपड़े का इस्तेमाल करने को कहा है, जिसमें कॉटन की मात्रा अधिक हो।

शासन ने यह भी ध्यान रखने को कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्रत्येक बेचे जा रहे वस्त्र के हर 2 मीटर की दूरी पर वस्त्र में प्रयुक्त कॉटन व पॉलिस्टर की मात्रा (प्रतिशत) स्पष्ट रूप से अंकित हो। गणवेश मेलों में इन निर्देशों के पालन वाले वस्त्रों के विक्रय के ही निर्देश दिये गये है। अर्थात 100 प्रतिशत सिंथेटिक पॉलिस्टर धागे के वस्त्र एवं ऐसे कोई वस्त्र जिसमें कि कॉटन एवं पॉलिस्टर की मात्रा की जानकारी अंकित न हो, उसका विक्रय पूर्णत: निषिध्द रहे। इन निर्देशों का सभी बी.आर.सी.को व्यक्तिश: पालन सुनिश्चित करना चाहिए।

राज्य शासन ने पालक शिक्षक संघ द्वारा क्रय किये जा रहे गणवेश के वस्त्र की सेम्पल की जांच भी कराने का निर्णय लिया गया है। ऐसे वस्त्र जो शासन के निर्देशों के अनुरूप नहीं है या उसमें उल्लेखित मात्रा के अनुरूप कॉटन का अंश नहीं है, के संबंध में होने वाली गलती के लिए जिम्मेदार अधिकारी, कर्मचारी, पालक शिक्षक संघ के पदाधिकारी#वस्त्र विक्रेता के विरूध्द प्रभावी कार्यवाही करने के निर्देश दिये गये है। जिला परियोजना समन्वयक यह भी सुनिश्चित करेगें कि पालक शिक्षक संघ द्वारा क्रय किये जा रहे वस्त्रों के संबंध में प्रत्येक ब्लॉक न्यूनतम पांच वस्त्रों के सेम्पल की जांच पावरलूम सर्विस सेंटर, बुरहानपुर से कराये। प्रत्येक नमूने की जांच पर आने वाला खर्च 125 रूपये का व्यय नि:शुल्क गणवेश योजना के अंतर्गत उपलब्ध राशि से किया जाए।