मंगलवार, 12 जुलाई 2011

फेसबुक पर फैले सैक्स रैकेट की रिपोर्टिंग पर संपादक को जान से मारने की धमकी, पुलिस ने साधा रहस्यमयी मौन

फेसबुक पर नौजवानों और बच्चों तथा नामी गिरामी नेताओं, बिजनेसमेनों , प्रतिष्ठित हस्तियों को फंसाने वाले काल गर्लों के रैकेट की रिपोर्टिंग करने पर भोपाल के एक अखबार ''देखो भोपाल के प्रधान संपादक अकील अली को गुण्डों द्वारा जान से मारने की धमकी 6 जुलाई 2011 को दी गयी है, घटना की रिपोर्ट अली द्वारा पुलिस को की गयी है किन्तु गुण्डे अभी तक पुलिस की पहुंच से परे हैं । उल्लेखनीय है कि फेसबुक पर हजारों की संख्या में काल गर्ल रैकट द्वारा फर्जी फेक आई.डी. बनाकर युवक युवतियों और प्रतिष्ठित लोगों को अपने जाल में फंसाया जाता है, अकील अली इसी पर रिपोर्टिंग कर रहे थे । ग्वालियर टाइम्स परिवार घटना की कठोर शब्दों में भत्र्सना करता है और देखो भोपाल के प्रधान संपादक अकील अली के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष में साथ देने व सहयोग का संकल्प व्यक्त करता है , ग्वालियर टाइम्स परिवार म.प्र. पुलिस से इल्तिजा करता है कि धमकी देने वाले गुण्डों को तत्काल गिरफ्तार किया जाये साथ ही म.प्र.शासन से पत्रकारों की सुरक्षा किये जाने के पुख्ता इंतजाम करने की मांग करता है । देखो भोपाल के संबंधित समाचार की न्यूज कर्टिंग संलग्न है  

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

जन लोकपाल : बीमारी से अधि‍क खतरनाक इलाज -कपिल सिब्‍बल

जन लोकपाल : बीमारी से अधि‍क खतरनाक इलाज -        कपिल सिब्‍बल

वि‍शेष लेख: लोकपाल 

 

 

-        कपिल सिब्‍बल *

 

यह समय इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की ओर से पेश किये जा रहे मनोरंजन से हटकर उन मुद्दों पर सोचने का है जो लोकपाल की स्‍थापना में बाधक बन रहे हैं।

 

श्री अन्‍ना हजारे और उनके द्वारा नामित लोगों की ओर से प्रस्‍तावित जन लोकपाल विधेयक के प्रावधानों का विश्‍लेषण हमारे संवैधानिक ढांचे की व्‍यापक विशेषताओं को ध्‍यान में रखते हुए जरूर किया जाना चाहिए। हमारे संविधान के तहत कार्यपालिका संसद और न्‍यायपालिका दोनों के प्रति जवाबदेह है। जब विपक्ष के सदस्‍य सरकार से नीतिगत निर्णयों पर स्‍पष्‍टीकरण मांगते हैं, सरकार के प्रस्‍तावित विधेयकों पर प्रतिक्रिया देते हैं और उसका विश्‍लेषण करते हैं तथा सूचनाएं मांगते हैं, तब यह संसद के प्रति जिम्‍मेदार होती है। संसदीय बहसों समेत तमाम सशक्‍त संसदीय प्रक्रियाओं के जरिए देशवासियों को बताया जाता है कि कार्यपालिका किस तरह कार्य कर रही है।

 

विधायिका, नामत: संसद के दोनों सदन न्‍यायालय के प्रति उत्‍तरदायी हैं जिसके पास न्‍यायिक समीक्षा के जरिए किसी भी विधेयक को संविधान की कसौटी पर परखने की शक्‍ति है। हमारे जनप्रतिनिधि भी अपने निर्वाचकों के प्रति जवाबदेह और जिम्‍मेदार होते हैं जब उन्‍हें सदन भंग हो जाने पर फिर से चुनाव मैदान में आना होता है। न्‍यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका दोनों से ही स्‍वतंत्र है और वह एक सार्वजनिक तथा खुली न्‍यायिक प्रणाली के तहत जवाबदेह है। बहुस्‍तरीय न्‍यायालयों की व्‍यवस्‍था से न्‍यायिक प्रणाली के सुधार में मदद मिलती है। न्‍यायाधीश महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा व्‍यक्‍तिगत रूप से भी विधायिका के प्रति जवाबदेह हैं। हालांकि इसका अब तक बहुत अच्‍छा परिणाम नहीं मिला है।

 

हमें एक ऐसे कानून के माध्‍यम से बड़े पैमाने पर जबावदेही सुनि‍श्‍चि‍त करने की आवश्‍यकता है, जो एक तरफ तो न्‍यायपालिका की स्‍वायत्‍ता और स्‍वतंत्रता को सुरक्षित रखे, वहीं दूसरी तरफ सख्‍त जवाबदेही तय करे। दूसरे शब्‍दों में राज्‍य का हर एक अंग, हमारी संवैधानिक प्रणाली का हर स्‍तंभ किसी न किसी रूप में एक-दूसरे के प्रति जवाबदेह है। यही हमारे संसदीय लोकतंत्र का मूल तत्‍व है।

 

यह मूल तत्‍व आज खतरे में है और लग रहा है कि श्री अन्‍ना हजारे और उनके नामित व्‍यक्‍तियों द्वारा प्रस्‍तावित जन लोकपाल विधेयक इसे खत्‍म कर देना चाहता है। प्रस्‍तावित विधेयक के अनुसार लोकपाल स्‍वतंत्र जांच और अभियोजन एजेंसियों से लैस एक ऐसा अनिर्वाचित कार्यकारी नि‍काय होगा, जो किसी के प्रति जिम्‍मेदार नहीं रहेगा। सरकार में नहीं होने के कारण यह सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं होगा, इसलिए केवल इसी के पास सभी सरकारी अधिकारियों की जांच का अधिकार होगा। यह विधायिका के भी प्रति जिम्‍मेदार नहीं होगा। सरकार से बाहर होने के कारण इसकी कार्यप्रणाली के बारे में सरकार को कोई जानकारी नहीं होगी, जो संसद में जानकारी दिये जाने के लिए सबसे पहली जरूरत है।

 

इसके अलावा, इसे संसद सदस्‍यों की भी जांच का अधिकार होगा। यह न्‍यायालय के प्रति भी तब तक जिम्‍मेदार नहीं है जब तक कि यह आपराधिक मुकदमों के प्रावधानों के तहत खुद कोई न्‍यायिक प्रक्रिया शुरु नहीं कर रहा हो। साथ ही, इसके पास न्‍यायपालिका के सदस्‍यों की जांच की अनोखी शक्‍ति होगी। किसी भी संवैधानिक संस्‍था के प्रति जवाबदेह नहीं रहने वाली इस संस्‍था की हैसियत संवैधानिक तौर पर न्‍यायसंगत नहीं ठहरायी जा सकती है।

 

उपरोक्‍त तर्कों का विरोध यह कहकर किया जाता है कि न्‍यायपालिका पर भी यही स्‍थितियां लागू होती हैं क्‍योंकि वह भी न तो विधायिका है और न ही कार्यपालिका के प्रति जवाबदेह है। दो कारणों से कहा जा सकता है कि यह तर्क भ्रामक है:

 

1.      सभी न्‍यायिक प्रक्रियाएं सार्वजनिक होती हैं और न्‍यायिक फैसलों की समीक्षा के लिए अपील तथा पुनर्विचार याचिकाओं जैसी व्‍यवस्‍था है। न्‍यायिक भूलों को उच्‍चतर न्‍यायालयों में सुधारा जा सकता है। दूसरी तरफ लोकपाल की अपनी जांच होनी अनिवार्य है।

2.      न्यायपालिका की स्‍वतंत्रता की तुलना लोकपाल के कार्यकारी प्राधिकारी की स्‍वतंत्रता से नहीं की जा सकती है, जिसका प्राथमिक कार्य जांच और अभियोजन करना है।

 

न्‍यायपालिका नागरिकों की रक्षा करने के लिए हैं। लोकपाल उन पर अभियोग चलाने के लिए है। न्‍यायपालिका विवादों को सुलझाती है, इसलिए इसकी स्‍वतंत्रता की रक्षा जरूर होनी चाहिए। यह लोगों पर अभियोग चलाने के लिए नहीं बनी है। दूसरा तर्क यह है कि लोकपाल वैसा ही है जैसे चुनाव आयोग तथा नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) स्‍वतंत्र संवैधानिक संस्‍थाएं हैं। यह तुलना भी अच्‍छी नहीं है। चुनाव आयोग का काम नियामक का तथा आवर्ती है और कैग का काम सरकारी विभागों और एजेंसियों के खर्चों का विश्‍लेषण करना है ताकि सरकार की ओर से उन्‍हें दी गयी राशि की बर्बादी नहीं हुई हो।

 

इसलिए, यह स्‍पष्‍ट है कि एक अनिर्वाचित लोकपाल जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हो, हमारी संसदीय प्रणाली की अवधारणा पर अभिशाप की तरह है।

 

एक और चिंताजनक बात है जन लोकपाल की सामान्‍य पूर्वधारणा। यह इस कल्‍पना के आधार पर अपना काम शुरु करता है कि भ्रष्टाचार  संस्थागत हो गया है और केवल बढ़ता ही जा रहा है क्‍योंकि भ्रष्टाचार के कारण मिलने वाले लाभ में सभी के साझीदार होने के कारण सरकारी विभागों में वरिष्‍ठ अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोपी अपने अधीनस्थ कर्मचारी को पूरी तरह संरक्षण देते हैं। नतीजन, भ्रष्ट कृत्यों पर कार्रवाई नहीं होती है और यदि होती है तो उसमें काफी देरी की जाती है। उनका यही तर्क राजनीतिक प्रक्रिया पर लागू होता है कि चूंकि राजनीतिक वर्ग भ्रष्ट है इसलिए वह ऐसे कानून नहीं बनाना चाहता है जो उन्हें जवाबदेह ठहराए। ये मान्यताएं पूरी तरह से सही नहीं हैं। मूल रूप से उनका कहना यह है कि अगर सरकार के बाहर एक लोकपाल स्‍थापित कर दिया जाता है, तो वहां निजी हितों का कोई प्रभाव नहीं होगा और लोकपाल व्‍यवस्‍था  को साफ सुथरा बनाने में सक्षम होगा। मुझे यह तर्क स्वाभाविक तौर पर दोषपूर्ण लगता है।

 

हम एक क्षण के लिए मान लें कि हमने एक ऐसे लोकपाल की स्‍थापना कर दी जिसके दायरे में केन्द्रीय सरकार के सभी (लगभग चार लाख) कर्मचारी हैं और हर राज्य में एक लोकायुक्त हो जिसके दायरे में संबद्ध राज्य सरकारों के सभी (लगभग 7-8 लाख) कर्मचारी हैं। यदि लोकपाल या लोकायुक्त को 10-12 लाख लोगों के भ्रष्ट कृत्यों पर कार्रवाई करनी है तो एक विशाल तंत्र की आवश्यकता होगी, जिसे बड़े पैमाने पर मानव संसाधन की भी जरूरत होगी और सरकारी कर्मचारियों के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार से निपटने के लिए भी काम करना होगा।

 

यह तंत्र कैसे विकसित होगा ? मानव संसाधन के स्‍तर पर आवश्यक सुविधाएं मौजूदा जांच एजेंसियों से ही लोकपाल को हस्तांतरित करनी होंगी। सीबीआई में उपलब्‍ध मानव संसाधन जो भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के तहत भ्रष्टाचार से निपटने के लिए काम कर रहा है, कुछ हद तक उसके और सरकार की अन्य जांच एजेंसियों के कर्मियों को एक साथ लोकपाल में स्थानांतरित करना होगा। इसके अलावा लोकपाल को अपनी जरूरतों के लिए कई वर्षों तक अलग से जांच और अभियोजन अधिकारियों की भर्ती करनी होगी।

 

यह समझ में नहीं आता है कि कैसे स्‍थानांतरित किये जाने वाले मौजूदा अधिकारी या लोकपाल के द्वारा बहाल किये जाने वाले नये अधिकारी अचानक  पवित्र और ईमानदार हो जाएंगे, वह भी, सिर्फ इस कारण क्योंकि उन्‍हें लोकपाल के अधीन काम करना है। ऐसी किसी संरचना को स्थापित करने का खतरा यह है कि वह एक ऐसे निरंकुश दानव का रूप ले लेगा जिसकी कोई जवाबदेही नहीं होगी और जो राज्य के बाहर एक दमनकारी संस्था के रूप में कार्य करने लगेगा। इसका परिणाम कहीं और अधिक खतरनाक होगा। इस लिहाज से, यह इलाज, इस रोग से भी बदतर हो जाएगा। संवैधानिक ढांचे के बाहर कोई ऐसा कार्यकारी निकाय नहीं बनाया जा सकता है जो किसी के प्रति जवाबदेह न हो, क्योंकि नि‍हि‍त स्‍वार्थों के कारण ऐसे संगठन के भ्रष्‍ट होने का खतरा ज्‍यादा है। खासकर, उस संवैधानिक ढांचे के तहत चल रही कार्यकारी प्रणाली की तुलना में, जहां नियंत्रण और संतुलन के माध्‍यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है।

(क्रमश:)

***

*केन्‍द्रीय मंत्री और संयुक्‍त मसौदा समि‍ति‍के सदस्‍य

 

भ्रमवश हुआ अर्थ का अनर्थ , शस्‍त्र व शास्‍त्र से प्रशिक्षित नौजवानों से आशय देश को शांतिप्रय देशभक्त नागरिक देना - बाबा रामदेव

पतंजलि योगपीठ की ओर से जारी एक पत्र में बाबा रामदेव ने मीडिया में शस्‍त्र व शास्‍त्र से प्रशिक्षित नौजवानों के समूह गठित किये जाने के बारे में साफ किया है , मैं और मेरे नौजवान समूह देशभक्त व देश की शांति के लिये कार्य करने वाले शस्‍त्र व शास्‍त्र प्रशिक्षित समूह होंगें जो कि देश सेवा के लिये , देश की शांति के लिये कार्यरत व कर्तव्यरत होंगें न कि अशांति फैलाने वाले नक्सली या अन्य आतंकी समूहों की तरह । बात पूरी स्पष्‍ट न होने से मीडिया में भ्रम फैल गया था । पतंजलि योगपीठ द्वारा जारी पत्र की यह प्रति इस समाचार में संलग्न है । आप इसे मूल रूप में पढ़ सकते हैं

सोमवार, 27 जून 2011

फुस्स फटाखा रामदेव और खोखले बांस से मेरा टेसू झईं अड़ा का सुर आलापते अन्ना

फुस्स फटाखा रामदेव और खोखले बांस से मेरा टेसू झईं अड़ा का सुर आलापते अन्ना

नरेन्द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

भाग-1

अभी फेसबुक पर अन्ना और रामदेव कांडों के सारे सिलसिले चलते कुछ मजेदार रोचक बातें जहॉं उभर कर सामने आयीं वहीं देश का नेतृत्व संभाल रहे जिम्मेवार आला नेताओं के भी जोरदार बयान आये, बयान युद्ध से लेकर अनशन संग्राम तक इस देश को पूरा एक लाइव टी.वी. सीरीयल देखने को मिला, देश ने बड़ी तसल्ली से पूरा टी.वी. सीरीयल देखा, सारे पात्रों की गजब की एक्टिंग भी देश ने देखी, सेंसर्ड सीन भी देखे तो अनसेंसर्ड भी जमकर देखा । हॉट बदनाम मुन्नी , हॉट शीला की जवानी भी देखने में आयी तो हॉट आइटम बॉय भी खूब देखने को मिले, कुल मिला कर मल्टी कास्ट मल्टी स्टार मल्टी मसाला फिल्म जनता को फोकट में देखने को मिली, जिसका हर सीन हर पल रोमांच और रोमांस से भरपूर फुल सस्पेन्स से रचा सना था ।

इधर अन्ना ने अपनी तुरही जंतर मंतर पर फूंकी उधर व्यायाम गुरू रामदेव का तन मन डोलने लगा और तमन्नायें बल्ली बल्ली उछल कर अंगड़ाईयां मारने लगीं । पूरी तरह बर्फ में लगी भाजपा को तलाशे तलाशे कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था उसके हाथ भी जैसे अलाउद्दीन का चिराग लग गया और लगी दनादन घिसने कि ओये जिन्न निकल, ओये जिन्न निकल , इस सबके दरम्यां केन्द्र सरकार के पहलवान एक एक कर अखाड़े में उतरते रहे और बिना कपड़े उतारे बल ठोकते रहे, कुल मिला कर नतीजा ये निकला कि अन्ना के पहले आंदोलन पर गिड़गिड़ा कर नतमस्तक हुये केन्द्र सरकार के पहलवानों ने चारों खाने चित्‍त होकर सारे अखाड़े का ऐसा तिया पांचा एक किया कि वो भूल गये कि वे सरकार हैं ।

भूल गये कि देश में संसद कहीं है, उन्हें ख्याल ही नहीं रहा कि जंतर मंतर पर जो हो रहा है वो इस देश के लिये , इस देश के संविधान के लिये, लोकतंत्र के लिये खुला चैलेंज है, देश में एक बागी जंतर मंतर पर अपने गिरोह को लेकर देश के लोकतंत्र को, देश की संसद को, भारत की जनता द्वारा चुनी गयी संसद को और सरकार को खुली बगावत कर खुली चुनौती दे रहा है, इससे देश का समूचा संसदीय लोकतंत्र, समूची संवैधानिक व्यवस्था और देश का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा, सरकार ने उसकी और उसके गिरोह की मांगें मान लीं । एक साझा मसौदा समिति गठित कर डाली, अब यह साझा मसौदा समिति किस कानून के तहत या संविधान के किस अनुच्छेद के तहत गठित हुयी ये देश में किसी को भी नहीं पता यहॉं तक कि खुद सरकार को भी नहीं पता ।

सरकार के इस कदर नैतिक रूप से गिरते ही राजनीतिक सपने और ख्‍वाबों में खोये व्यायाम बाबा की तमन्नाओं को पंख मिल गये और एक ऊंची राजनीतिक परवाज की ओर उनका दिल मचलने लगा, रामदेव की इस हवाई परवाज में आर.एस.एस. और भाजपा ने जम कर हवा भर दी, रामदेव फूल कर गुब्बारा हो गये ।

पूरी सुनियोजित योजना के तहत रामदेव ने दिल्ली में अपना आलीशान 5 स्टार तम्बू रामलीला मैदान में सजा दिया और बाबा का ढाबा का बोर्ड मीडिया ने टांग दिया, बाबा फूल फूल कुप्पा हुये जा रहे थे, मीडिया भाजपा और आर.एस.एस. बाबा की सारी पंक्चर भूल भुला कर दनादन पंपिंग मार मार कर हवा भरने में लगा था , बाबा ने रणनीति के तहत सरकार से बात शुरू की अनपेक्षित रूप से सरकार ने बाबा की सारी मांगें मान लीं और 500 या 1000 के नोट बंद किये जाने की मांग अव्यवाहारिक होने से बातचीत से बाहर कर दी, अब कायदा यह कहता था कि रामदेव समस्या उठाने के साथ समाधान भी साथ लेकर जाते और अपना समाधान सरकार को सुझाव के रूप में सौंपते , मगर रामदेव के पास केवल समस्यायें थीं, समाधान कोई नहीं था ।

कालेधन की बात करते करते रामदेव भूल गये कि जिस काले धन का जिकर वे कर रहे हैं वह धन है कहॉ वो तो खुद रामदेव को भी नहीं पता, फिर भी रामदेव बोले कि 400 लाख करोड़ का कालाधन है जो विदेश में जमा है, रामदेव से सरकार पूछना भूल गयी कि रामदेव ये जो 400 लाख करोड़ धन है जिसका तुम्हें पता है और हमें नहीं पता, जरा उसका पता तो दो कि वह किस बैंक में किस किस खाते में किस किस देश में जमा है जरा खाते नंबर और बैंक का नाम एवं देश का नाम तो बताओ तो लाओ हम कल से ही पड़ताल शुरू करते हैं और कालाधन वापस लाते हैं , सरकार की इस मूर्खता भरी चूक का बहुतों ने फायदा उठाया और सबने कालेधन के बारे में अपने अपने मनगढ़न्त आंकड़े बताने शुरू कर दिये कोई बोला 3000 करोड़ है कालाधन तो कोई बोला कि 50 हजार करोड़ रूपये का कालाधन है .....

क्रमश: जारी .. अगले अंक में                     

 

गुरुवार, 9 जून 2011

म.प्र.में बिजली सप्लाइ ठप्प : चंबल में बिजली कटौती फिर सिर चढ़ कर बोली ..........

म.प्र. में बिजली सप्लाइ ठप्प : चंबल में बिजली कटौती फिर सिर चढ़ कर बोली ..........

मुरैना 9 जून 2011 । मुरैना एवं भिण्‍ड जिला में प्रतिदिन की जा रही साढ़े सात घण्‍टे की डिक्‍लेयर्ड बिजली कटौती के बाद अब भीषण गर्मी के मौसम में अतिरिक्‍त बिजली कटौती का चम्‍बल संभाग के निवासियों को और अधिक सामना करना पड़ रहा है ।

आजकल जहॉं रात में शाम 5 बजे  से रात 12 बजे तक की अतिरिक्‍त बिजली कटौती की जा रही है वहीं इस भीषण गर्मी में प्रात: साढ़े पांच बजे से काटी गयी बिजली कटौती इस समाचार के लिखे और प्रकाशित किये जाने के वक्‍त तक समूचे चंबल संभाग में बिजली कटोती जारी है । वर्तमान में शहर में बिजली का शट डाउन चल रहा है । उल्लेखनीय है कि चम्‍बल के ६५ फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में बिजली है ही नहीं वहीं जहॉं हैं वहॉं दो दिन छोड़ कर महज ४ घण्‍टे के लिये मात्र बिजली दी जा रही है । ऐन भीषण गर्मी में की जा रही अनाप शनाप भारी बिजली कटौती से जनता में भारी रोष व आक्रोश व्याप्‍त हो गया है । स्‍मरणीय है मुरेना शहर चम्बल संभाग का संभागीय मुख्‍यालय है । इस दरम्‍यान बिजली घर का शिकायत दर्ज कराने का फोन नंबर ०७५३२- २३२२४४ सहित सभी अधिकारीयों एवं कर्मचारीयों के फोन बन्‍द चल रहे हैं जो कि हरदम बिजली शट डाउन करने से पूर्व आउट ऑफ क्रेडल एवं स्विच आफॅ कर लिये जाते हें ।  

 

बुधवार, 8 जून 2011

विशेष लेख: कृषि : रोजगार का जरिया बन सकती है ग्वारपाठा की खेती

विशेष लेख: कृषि : रोजगार का जरिया बन सकती है ग्वारपाठा की खेती

श्री मनोहर कुमार जोशी*

राजस्थान में ऐसे बेरोजगार युवक जिनके पास कम से कम एक हैक्टेयर कृषि भूमि है, उनके लिए ग्वारपाठा (एलोवेरा) की खेती रोजगार का जरिया बन सकती है। शुष्क और उष्ण जलवायु में पैदा होने वाली ग्वारपाठा की खेती के लिए राजस्थान की जलवायु और मिट्टी सर्वाधिक उत्तम मानी जाती है। ग्वारपाठा मूलत: दो प्रकार का होता है, एक खारा ग्वारपाठा और दूसरा मीठा ग्वारपाठा। खारा ग्वारपाठा आयुर्वेदिक औषधियों एवं सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री तैयार करने के लिए काम में लिया जाता है, जबकि मीठा ग्वारपाठा का इस्तेमाल अचार और सब्जी बनाने के लिए होता है।

कृषि विशेषज्ञों एवं जानकारों के मुताबिक राजस्थान में फिलहाल तीन हजार हैक्टेयर से अधिक भूभाग पर किसान ग्वारपाठे की खेती कर रहे हैं। एक हैक्टेयर में ग्वारपाठा के बीस हजार पौधे लगाये जा सकते हैं। इस पर वर्ष भर में 50 से 60 हजार रूपये का खर्चा आता है। पूरे साल में वर्षा के मौसम को छोड़ कर करीब 12 बार सिंचाई की जरूरत होती है। गर्मी के मौसम में महीने में एक अथवा दो बार सिंचाई करनी पड़ती है। ग्वारपाठे की अच्छी फसल के लिए 15 टन प्रति हैक्टेयर गोबर की खाद दी जा सकती है। एक साल बाद पत्तियों के रूप में उत्पादन शुरू हो जाता है। सिंचित क्षेत्र में 30 टन तथा असिंचित क्षेत्र में 20 टन प्रति हैक्टेयर सालाना ग्वारपाठे का उत्पादन होता है।

एक किसान को ग्वारपाठा की खेती से लगभग 40 हजार रूपये प्रति हैक्टेयर लाभ हो जाता है। ग्वारपाठे की पत्तियों की तुड़ाई वर्ष में तीन से चार बार की जाती है। किसान को मण्डी अथवा बाजार में फसल ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती है। ग्वारपाठा के उत्पाद बनाने वाली फर्म अथवा इकाईयों से सम्पर्क करने पर उनके प्रतिनिधि खुद खेत पर आकर कटी पत्तियां खरीद ले जाते हैं। खेत में एक बार इसे उगाने के बाद इस पौधे का विस्तार होता रहता है।

मदर प्लांट्स (मातृ पौध) के पास डॉटर प्लांट्स (प्ररोह-छोटे पौधे) तैयार होते रहते हैं। किसान इन छोटे पौधों को बेच कर अतिरिक्त लाभ भी कमा सकते हैं। ग्वारपाठे के छोटे पौधों की पहली बार खेती करने वाले अथवा नर्सरी लगाने वाले खरीद कर ले जाते हैं। किसान को अपने खेत में ग्वारपाठे उगाने के लिए

छोटे पौधों को खरीदते समय इस बात की सावधानी रखनी चाहिए की प्ररोह 9 से 12 इंच का हो, इससे छोटे पौधे सस्ते तो मिल जाते हैं, लेकिन इन पौधों के विकसित होने से पहले ही उनके नष्ट होने का खतरा रहता है। ग्वारपाठे के छोटे पौधे एक से डेढ़ रूपघ् में मिल जाते हैं।

राजस्थान में ग्वारपाठा की खेती बीकानेर संभाग में सर्वाधिक होती है। इसके अलावा जोधपुर संभाग में भी कई गांवों में इसकी खेती की जा रही है। इस औषधीय पौधे की खेती के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन प्रति हैक्टेयर 20 प्रतिशत का अनुदान 5 हैक्टेयर तक प्रदान करता है। उद्यान निदेशालय की एक रिपोर्ट के अनुसार एक हैक्टेयर पर ग्वारपाठा की खेती के लिए होने वाले 42500 रूपये के खर्च में से 8500 रूपये का अनुदान सरकार उपलब्ध कराती है। जोधपुर स्थिति केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान एकाजरी एवं जयपुर के समीप जोबनेर में कृषि अनुसंधान केन्द्र में ग्वारपाठे की खेती के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा जयपुर में कृषि पंत भवन में उद्यान निदेशालय से भी विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आयुर्वेद में घृतकुमारी और स्थानीय बोलचाल में ग्वारपाठा के रूप को जानने वाले इस प्राचीन पौधे की औषधीय उत्पादों में खास उपादेयता है, जबकि सौन्दर्य प्रसाधान की सामग्री में यह ग्वारपाठा के रूप में लोकप्रिय है। हर्बल उत्पादों की वस्तुओं में ग्वारपाठा सबसे पहले पाया जाता है।

जोधपुर संभाग के जैसलमेर जिले के पोकरण, राजमथाई, डाबला, बांधेवा आदि गांवों में ग्वारपाठे की खेती का विस्तार हो रहा है। यहां होने वाला ग्वारपाठा तीन रूपये प्रति किलोग्राम की दर से हरिद्वार भेजा जाता है। इसकी खेती करने वाले सागरमल, जोगराज एवं हाजी खां के अनुसार हरिद्वार स्थित आयुर्वेदिक औषधियां बनाने वाली एक कंपनी अपना वाहन लेकर यहां आती है तथा ग्वारपाठा खरीद कर ले जाती है।

जिले में 200 बीघा से अधिक भूमि पर इसकी खेती की जा रही है। इसके अतिरिक्त नागौर, अजमेर, सीकर, झुंझुनू घ्घ्घ् चुरू सहित राज्य के विभिन्न जिलों में इसकी खेती के प्रति किसानों में जागृति आयी है तथा किसान ग्वारपाठा की खेती से जुड़ने लगे हैं।

सीकर जिले के एक किसान को ग्वारपाठे का महत्व उस वक्त समझ में आयाए जब खेत-खलिहान में लगी आग से वहां बंधी भैंसे झुलस गई और उसके उपचार में ग्वारपाठा का गूदा रामबाण औषधि साबित हुआ।

पाली जिले के निमाज गांव के प्रगतिशील किसान श्री मदनलाल देवड़ा जिन्होंने अपने खेत पर ग्वारपाठा और आंवला उगाकर इसका मूल्यसंवर्धन तथा प्रसंस्करण करना शुरू कर दिया है, वे बताते हैं कि मैंने अपने खेत में आंवला एवं ग्वारपाठा की खेती को चुनौती के तौर पर लिया। आज मेरे खेत में साढ़े तीन हैक्टेयर में ग्वारपाठा उगा हुआ है। शुरू में लागत ज्यादा आती है, इसलिए किसान कतराता है। वहीं दूसरी ओर इसकी प्रक्रिया का कार्य करोड़पतियों के हाथ में होने से किसानों को उनकी ओर देखना पड़ता है। वे कहते हैं कि मुझे आज भी याद है कि मैंने चुरू में आंवले का ज्यूस चार बोतल से शुरू किया था। बीच-बीच में ऐसा भी लगा कि क्या मैं अपने उत्पाद बाजार में चला पाऊंगा ? लेकिन उत्पाद की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया तथा हौसला नहीं छोड़ा। आज मुझे इस बात की खुशी है कि दक्षिण भारत के बंगलुरू और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में मेरे द्वारा तैयार ग्वारपाठा एवं आंवला के रस ने दस्तक दे दी है और दो से ढाई लाख रूपये का रस हर माह वहां भेज रहा हूं। पाली जिले में इस समय 27 हैक्टेयर पर इसकी खेती की जा रही है। नागौर में भी कुछ काश्तकार इसकी खेती तथा फसलोत्तर कार्य में लगे हुये हैं।

इसकी खेती करने वाले काश्तकारों के अनुसार ग्वारपाठा का पौधा ऐसा पौधा है, जो थोड़ी .सी मेहनत के बाद बंजर भूमि में भी उग जाता है। इसे पशु, पक्षी तथा जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। राजस्थान के मरूस्थलीय इलाके में रासायनिक खादों का कम उपयोग होने से जैविक उत्पादन ज्यादा प्राप्त हो सकता है।

एक कृषि अधिकारी के मुताबिक राजस्थान में ग्वारपाठा के प्रसंस्‍करण कार्य में छोटी-बड़ी 20 से 30 इकाईयां लगी हुई हैं। ये इकाईयां बड़े उद्योगों की मांग के अनुरूप माल की आपूर्ति करती हैं। आने वाले समय में राजस्थान में व्यापक स्तर पर इसकी खेती की जा सकती है।

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स्वतंत्र पत्रकार