गुरुवार, 4 मार्च 2010

मकबूल पर फिदा है हिंदुस्तान- राकेश अचल

मकबूल पर फिदा है हिंदुस्तान

राकेश अचल

(लेखक ग्‍वालियर चम्‍बल के वरिष्‍ठ एवं विख्‍यात पत्रकार हैं )

      मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन फिर चर्चा में है इस बार चर्चा की वजह हुसैन का ब्र नही बल्कि उन्हे कतर गणराज्य की ओर से पेश की गई नागरिकता है।

      95 वर्ष के मकबूल फिदा हुसैन भारत मे जन्मे है। उनके कैनवास पर सातो रंग पूरी शिद्दत के साथ सांस लेते है। मकबूल साहब अपनी मौलिकता की वजह से सदैव विवादो में रहते है। कभी विवाद की जड़ उनका अपना सौदंर्यबोध होता है, तो कभी भारतीय मान्यताओं, आस्थाओं को लेकर उकेरी गई आकृतियां।

      मकबूल फिदा हूसैन वर्षो से पेरिस में रह रहे है। भारत के कट्टरवादी हिंदू संगठन कई बार मकबूल साहब को कबूल करने के बजाय उन्हे नकार चुके है। उनके पुतले जला चुके है, गिरफ्तार की मांग कर चुके है। मकबूल फिदा हुसैन पर आरोप है उन्हे हिंदू देवी देवताओ की आपत्जिनक आकृतियां बनाकर उनका मजाक उडाया।

मकबूल साहब जिस मजहब से ताल्लुक रखते है, उसमें बुतपरस्ती की साफ मुमानियत है। बावजूद इसके मकबूल फिदा हुसैन ने अपनी पूरी उम्र कागजो पर बुत बनाने में खर्च कर दी। कभी  उनके बुश से पशु-पक्षी जीवित हुए तो कभी जीवन की जटिल जाएं। कभी उन्होने नारी सौदंर्य को गजगमिनी बनाकर उकेरा तो कभी भारतीय देवी देवताओं की नृत्य करती मुद्राएं। इस पर मकबूल का विरोध करने वालो से पूछा जाना चाहिए कि क्या कोई व्यक्ति भारतीय दर्शन को समझे बिना यह सब कर सकता है?

      मकबूल फिदा हुसैन अगर अश्लील होते, असामान्य होते,  अराजक होते तो क्या दुनिया उनकी कृतियों को हीरे-जवाहरात की कीमत पर खरीदती? शायद नहीं। लेकिन मकबूल के हर केनवास की कीमत है। यह कीमत ही साबित करती है कि मकबूल के हर रंग में इंसानियत की जिंदगी पर फिदा होने की ताकत देने का माद्दा है।

      जिंदगी को अपने ठंग से जीने वाले इस महान और सर्वकालिक कलाकार पर पूरा देश गर्व करता है। मकबूल साहब पूरी दुनियां में भारतीय कला का प्रतिनिधित्व करते है। कला के माध्यम से जीवन मूल्यो को समझने परखने की अंर्तदृष्टि किसी भी कट्टरपंथी के पास नही होती। अगर होती तो मकबूल फिदा हुसैन को गरियाया नहीं जाता। धमकाया नही जाता।

      भारत में फिलहाल दोहरी नागरिकता का प्रावधान नही है। इसलिए मकबूल साहब के लिए कतर की नागरिकता कबूल करना उचित नही है। वे अपनी सरजमीन पर आकर सुकून से रह सकते है। यह मुल्क उनका अपना है, वे मुल्क के अपने है।

      जो लोग मकबूल फिदा हुसैन को जानते है उन्हे पता है कि वे आम हिंदुस्तानी से कहीं ज्यादा समर्पित हिंदुस्तानी है। उन्होने एक बार भी ऐसा नहीं कहा कि वे अपनी जन्मभूमि से मुक्ति चाहते है। उनका पेरिस में रहकर काम करना कोई अजूबा नही है पेरिस दुनियां के तमाम मकबूल कलाकारों की कर्मस्थली रही है। पेरिस में होने का मतलब यह कतई नहीं होता कि वहा रहने वाले दूसरे मुल्को के लोग अपना वतन भूल गए।

      मकबूल फिदा हूसैन पर हम भारतवासियों को उसी तरह गर्व है, जिस तरह कि हरगोविंद खुराना पर है, अर्मत्य सेन पर है, मदर टैरेसा पर है। इन सबकी वजह से दुनियां में हिंदुस्तान का मान बढा है। दुनिया से मकबूल की कद्र उनकी कूची की वजह से तो ही है, लेकिन एक उम्दा हिंदुस्तानी होने के नाते भी है।

      मकबूल साहब को कतर की पेशकश की वजह से एक बार फिर राजनीति में घसीटा जा रहा है, लेकिन ऐसा करने वालो को नही पता मकबूल को मशहूर करने वाली कोई राजनीतिक पार्टी या खानदान नही है। मकबूल अपनी कला की दम पर मशहूर और दुनिया भर में कबूल किए गए है। इसलिए उन्हे मशविरा देने या कोसने का हक किसी भी राजनीतिक दल को नही है। (भावार्थ)

 

 

श्रमजीवी पत्रकार संघ का प्रांतीय अधिवेशन सागर में 6 व 7 को

श्रमजीवी पत्रकार संघ का प्रांतीय अधिवेशन सागर में 6 7 को

ग्वालियर। मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ का प्रांतीय अधिवेशन 6 7 मार्च को सागर में आयोजित किया जा रहा है। इसमें प्रांतीय कार्यकारिणी के चुनाव संगठनात्मक चर्चा की जाएगी। यह जानकारी संघ के प्रांतीय संयुक्त सचिव विनय अग्रवाल व संभागीय अध्यक्ष सुरेश शर्मा ने दी है।

श्री अग्रवाल व श्री शर्मा ने सभी जिला इकाईयों को कहा है कि वह अधिक से अधिक संख्या में सागर पहुंचे। उन्होंने कहा कि संभाग भर से बड़ी संख्या में पत्रकार सागर जाएंगे।

 

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

व्‍यंग्‍य: होरी की वेदना ..;; रंग के बादर फट गये - नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

व्‍यंग्‍य: होरी की वेदना ..;; रंग के बादर फट गये

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

होरी की हुरियारी में छायी मस्‍ती चारों ओर ।

छायी मस्‍ती चारों ओर मगर कछु दुबके फिरते ।।

लिये हाथ में रंग सफेदा, भरें अबीर, गुलाल चहकते ।

भरें अबीर गुलाल चहकते, मगर कछु बिल में घुसते ।।

बिलवाले दिलवाले से होरी वारे कह रहे ।

काहे बिल में दिल घुसा, सब चिन्‍ता कर रहे ।।

कब तक बिल में घुसे पड़े दिल की खैर मनाओगे ।

बिन धड़कन के दिल बिल की कब तक आह छुपाओगे ।।

कोई चोर डकैत आवेगा बिल खोद खाद ले जायेगा ।

दिल चोरी हो या लुट जावे कोई रोज रात को आयेगा ।।

कब तक जाग जाग ऑंखों में पहरेदारी कर पाओगे ।

कब तक चोरी चोरी आ आ कर नजर निगाही कर पाओगे ।।

इक सलाह हुरियारे दे रहे बात बता कर खास ।

छिप्‍पन और छिपावन कर दिल बचने की ना आस ।।

गर दिलवाले बिल में घुसकर दिल जो बचाते ।

तो सब दिलवाले अब तक बिल में घुस जाते ।।

इक मिला था लवली स्‍वीट था, दिल का बस ये रोना है ।

अब चला गया तो चला गया, तेरे छिपने सा का होना है ।।

कौन ले गया लेने वाला, ले गया जो ले गया ।

ले गया कैसे गया, अब गया चला तो चला गया ।।

क्‍या हो गया चोरी दिल ये, या हो गयी लूट ।

बिल में दुबकी सोच रही, मेरी किस्‍मत गयी है फूट ।।

किस्‍मत गयी है फूट, सबको क्‍या मुख दिखलाऊं ।

बिन दिल के अब इस बिल से कैसे बाहर जाऊं ।।

बाहर कुत्‍ते हैं खड़े, करते इंतजार मनुहार ।

पूंछ हिला कर कह रहे, आओ जी सरकार ।।

आओ जी सरकार, हमारे यार, डिनर तैयार रखा है ।

मुर्गे की है स्‍वीट बनाई नहीं जो अब तक चखा है ।।

प्‍लीज जागिये, उठ बैठिये, मैडम अक्‍कलमंद ।

सारे कुत्‍ते आये हैं ले लेकर अपने बिस्‍तर बंद ।।

लेकर बिस्‍तर बंद, द्वार पर वे खड़े भुंकियावैं ।  

देसी और विलाइती सारे अदायें वे दिखलावैं ।।

सारे कुत्‍ते कर रहे पिछले दो हफ्ता से उपवास ।

मैडम संग इक डिनर करिहे पूरी सबकी आस ।।

होगी पूरी सबकी आस, सोच लाइन कुत्‍तन की लग गई ।

बिन दिलवाली मैडम की, भौंका भाकी में निंदिया खुल गई ।।

 

इक अंगड़ाई मार के, फेंक नजर के तीर ।

सब कुत्‍तन को देख के, मैडम भई गंभीर ।।

मैडम भई गंभीर, और फिर दौड़ के बाहर आई ।

मैं इक कुत्‍ते की थी प्‍यारी ये लाइन कहॉं से आयी ।।

है मेरा अलबेला कहॉं, झबरू काला रंग ।

दिल मेरा जो ले गया, कित गया भुजंग ।।

मैं कुत्‍ते की, कुत्‍ता मेरा, पिया वो परम सुहावन ।

डिनर करूं और रूप रचूं  बार बार फिर देखूं दरपन ।।

मेरा झबरू मेरा गबरू नहीं लाइन में आता नजर ।

कित्‍थे है वो मेरा डमरू मैं कराऊंगी उसे डिनर ।।

तभी बीच कुत्‍तों में से था झबरू दौड़ा आया ।

मैं भी इस लैन बिच्‍च में अपनी संगत लाया ।।

ओ हसीना नाजनीना जरा याद करो वो बात बड़ी मशहूर ।

कुत्‍ते सदा झुण्‍ड में रहते मिल बांट कर खाते हैं भरपूर ।।

बीच बीच में भौं भौं कूं कूं, उवाय उवाय भ्‍वयाय ।

जम कर सेवा पूंछ हिलाना, बिना बखत चिल्‍लाय ।।

पर अपनी अपनी किस्‍मत होती क्‍या करिये इसको ठीक ।

जैसी लीला रची विधि ब्रह्मा ने वही होवेगा याद रहे ये सीख ।।

याद ये रखना सीख, नहीं झुण्‍ड शेरों के होते ।

इक अकेला कूद जाये जब सब पानी भरते ।।

नहीं डिनर ना सोवा सावी ना सस्‍ती मस्‍ती करो इन कुत्‍तन के संग ।

शेर कहत बुरा न मानो होली है, आप पर अब आपका फेंक दिया है रंग ।।

 

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

मंदी व मंहगाई की मार झेलती जनता हो रही है ठगी का भी शिकार- निर्मल रानी

मंदी व मंहगाई की मार झेलती जनता हो रही है ठगी का भी शिकार

 

निर्मल रानी     

फोन-0171- 253562}  163011, महावीर नगर,

अम्बाला शहर,हरियाणा।

email:

nirmalrani@gmail.com

 

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर छाई मंदी जहां बड़े -बडे  उद्योगों तथा कारपोरेट जगत से जुडे लोगों को आर्थिक संकट से ठीक तरह से उबरने नहीं दे रही है वहीं बेतहाशा बढ़ती महंगाई ने भी आम लोगों की कमर तोड़ कर रख दी है। हालांकि सरकार द्वारा मंदी व महंगाई को लेकर तरह तरह के तर्क  पेश किए जा रहे हैं परंतु हकींकत तो यही है कि अब आम जनता पर इन आर्थिक हालात का प्रभाव पड़ता सांफ दिखाई दे रहा है। आम लोगों के खाने की थाली में या तो दाल व सबियों की कटोरी की संख्या में कमी आते देखी जा रही है या फिर इनकी मात्रा घटती जा रही है। कोई नाश्ता करना बंद कर मंहगाई से जूझने के तरीके अपना रहा है तो कोई भोजन की मात्रा में ही कमी करने को ही मजबूर है। परंतु इन्हीं हालात के बीच देश में एक  वर्ग ऐसा भी सक्रिय है जिसपर मंदी या मंहगाई का कोई असर नहीं देखा जा रहा है। और यह वर्ग जनता में लालच पैदा कर तथा उन्हें तरह तरह के विज्ञापनों के माध्यम से अपनी ओर आकर्षित कर उनकी जेब पर डाका डालने का क ाम कर स्वयं ख़ूब धन कमा रहा है। इनके द्वारा मंहगाई व मंदी की परवाह किए बिना जनता से मोटे नोट वसूले जा रहे हैं।

                              ठग सम्राट नटवर लाल के एक कथन का यहां उल्लेख करना उचित होगा। कांफी पहले नटवर लाल ने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह कथन प्रस्तुत किया था कि जब तक  संसार में लालच ंजिंदा है तब तक ठग कभी भूखा नहीं मर सकता। निश्चित रूप से आज चाराें ओर उसी कथन की पुष्टि होती दिखाई दे रही है। रोंजमर्रा के प्रयोग में आने वाली अधिकांश दैनिक उपयोगी वस्तुओं की बिक्री हेतु जो ऑंफर दिए जाते हैं उनमें फ्री शब्द का उल्लेख बड़े मोटे अक्षरों में किया जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि आप एक टूथ पेस्ट ंखरीदते हैं तो उसके साथ टूथब्रश फ्र ी होने का लालच कंपनी द्वारा दिया जाता है। इस प्रकार के अनेकों उत्पाद ऐसे हैें जो दो के साथ एक फ्री या चार के साथ एक फ्री आदि अलग-अलग शर्तों व नियमों के हिसाब से बेचे जा रहे हैं। यहां तक कि अब तो ग्राहक स्वयं ऐसी फ्री योजनाओं वाली वस्तुओं की मांग करने लगा है। लगता है भारतीय बांजार की इस नब्ंज की न के वल बड़े व मध्यम वर्गीय उद्योगों द्वारा पहचान कर ली गई है बल्कि छोटे स्तर पर भी उपभोक्ताओं की इसी कमंजोरी का ंफायदा उठाया जाने लगा है।

            इसी प्रकार  ंफर्जी व ठगी से परिपूर्ण कारोबार में लालच में फसाने की शुरुआत टोल फ्री टेलींफोन नंबर का आकर्षण दिखाकर शुरु होती है। आम जनता टोल फ्री नंबर के झांसे में आकर सम्बध्द कंपनी से बात तो कर लेती है परंतु इसके  पीछे के इस रहस्य को वह अनदेखा कर देती है कि कंपनी अपने ऑंफिस या उद्योग का पूरा पता प्रकाशित या प्रसारित करने के बजाए केवल टोल फ्री नंबर से ही आख़िर क्यों अपना काम चलाना चाह रही है। और यही टोल फ्री नंबर किसी भी ग्राहक को अपनी ओर आकर्षित करने में वही भूमिका अदा करता है जोकि मछली फंसाने हेतु कांटे में लगाए गए चारे की होती है। आईए अपनी बात की शुरुआत प्रसिद्ध स्काईशॉप द्वारा विभिन्न टी वी चैनल्स पर प्रसारित होने वाले विभिन्न सांजो-सामानों के  विज्ञापनों में से एक की करते हैं। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मैं स्वयं ऐसी एक घटना की भुक्तभोगी हूं। स्काईशॉप द्वारा किसी चैनल पर बार-बार एक विद्युत संबंधी सामग्री के दिए जाने वाले विज्ञापन ने मुझे आकर्षित किया। बहुत अच्छे व तर्कपूर्ण तरीक़ ों से विज्ञापन द्वारा यह समझाया जा रहा था कि अमुक यंत्र ंखरीदने से तथा उसे अपनी विद्युत लाईन में लगाने से आपके घर की बिजली की खपत में 30 से लेकर 40 प्रतिशत तक की कमी आ जाएगी। टोल फ्री नंबर पर मैंने बात की। दूसरी ओर से भी मुझे पूरी तरह से यह समझा दिया गया कि यह दुनिया का सबसे अधिक बिकने वाला प्रॉडक्ट है तथा इसकी पूरी गारंटी भी है। कोई एडवांस भी नहीं है। मैंने उस व्यक्ति को अपना नाम व पता सब कुछ बता दिया। मात्र एक सप्ताह के भीतर हमारा पोस्टमैन एक गत्ते के डिब्बे में वी पी पी डाक लेकर हांजिर हो गया। डिब्बा देखने में तो अवश्य कुछ    आकार घेरने वाला अर्थात् लगभग पंखे के पुराने टाईप के रेगयूलेटर जैसे साईंज का था। परंतु हाथ में लेने पर उसका वंजन 50 ग्राम भी प्रतीत नहीं हो रहा था। बहरहाल चूंकि हमारा नियमित रूप से आने वाला पोस्टमैन  हमारे ही दिये हुए आर्डर की वी पी पी लाया था अत: उसे छुड़ाना लांजमी था। लगभग 2500 रुपये अर्थात् निर्धारित ंकीमत देकर मैंने वह वी पी पी छुड़ा ली। डिब्बा खोला तो उसमें प्लास्टिक के डिब्बे का एक सील बंद बाक्स नंजर आया। उसमें दो इंडिकेटर लगे थे। उसे लगाने हेतु निर्देश पत्र भी साथ था। बहरहाल मैंने मिस्त्री बुलाया,उसे उक्त यंत्र दिखाया तथा उसने कुछ सामान मंगाकर उक्त यंत्र लगा दिया।

            विज्ञापन में प्रदर्शित यंत्र के अनुसार उसमें लाल बत्ती जलनी चाहिए थी। जोकि नहीं जली। जब मैंने इस बात का ंजिक्र पुन: टोल फ्री नंबर पर किया तब उसने पहले तो मुझसे ही कई प्रश् ऐसे कर डाले जिससे लगा कि मैंने ही यह यंत्र ख़रीदकर ंगलती की है। बाद में उक्त व्यक्ति ने ंफोन पर मुंबई का  एक पता बताते हुए कहा कि इस पते पर वह यंत्र तथा उसके साथ भेजी गई मूल रसीद आदि सब कुछ पार्सल द्वारा भेज दें। यहां मुझे यह सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा कि पैसे ख़र्च करने के बाद जब नया यंत्र काम नहीं कर रहा है फिर आख़िर इस यंत्र व उसकी रसीद  मुंबई वापस भेजने के बाद हमें क्या राहत मिल सकेगी। मुझे तब यह यंकीन हो गया कि मेरे साथ ठगी हो चुकी है और मैं आज भी बिजली बचाने की लालच में 2500 रुपये ख़र्च कर वह इलेक्ट्रिक सेवर जैसा बोझ लेकर घर में बैठी हूं। अंफसोस तो इस बात का है कि इलेक्ट्रिक सेवर को लेकर मेरे ंजेहन में यह बात बाद में आई कि यदि कोई ऐसा यंत्र सरकार तथा वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित किया गया होता तो ऐसी चींज बांजार में बिजली के सामान संबंधी दुकानों पर उपलब्ध होती तथा मंहगी बिजली के इस दौर में घर-घर में लगी दिखाई दे रही होती।

            इसी प्रकार के टोल फ्री नंबर देकर आज कल सेक्स संबंधी दवाएं बेचने का दावा किया जा रहा है। कोई गंजों के सिरों पर बाल उगा रहा है तो कोई मर्दाना तांकत बढ़ाने की दवाई बेच रहा है। कोई दवाईयों से मोटापा कम कर रहा है तो कोई शरीर की लंबाई बढ़ाने की लालच दे रहा है। कोई बालों का झड़ना रोक रहा है तो कोई काली चमड़ी को गोरी करने के उपाय बता रहा है। जादू टोना, ज्योतिष,बेऔलाद को औलाद, पत्थरी का शर्तिया इलाज जैसे तमाम फ़ंर्जी विज्ञापनों की तो मानों होड़ लगी हुई है। ज्योतिषियों तथा नग-पत्थर आदि के विक्रे ताओं के नेटवर्क ने तो हद ही ख़त्म कर दी है। इनके विज्ञापन देखिए तो आपको लगेगा कि मात्र एक नग धारण करने से ही आपको आपकी मनचाही हर वह चींज मिल जाएगी जोकि आपको आपके अथक प्रयासों के बावजूद अब तक नहीं मिल सकी है। चाहे वह नौकरी हो या वर-वधू,स्वास्थ्य हो या अन्य किसी बड़ी समस्या से छुटकारा। यहां तक कि धन संपत्ति,रोंजगार और तो और प्रेम-प्रसंग में सफलता का झंडा गाड़ने का दावा भी ज्योतिषियों के यह विज्ञापन करते हैं।

            जनता के हित में यहां मैं एक रहस्योदघाट्न यह करना चाहती हूं कि टोल फ्री ंफोन नंबर अथवा किसी विज्ञापन के समर्थन में प्रकाशित होने वाले ग्राहकों के बयानों से आप पूर्णतया सचेत रहें। क्योंकि जिस ग्राहक की ंफोटो, किसी विशेष दवा अथवा अन्य प्रॉडक्ट के पक्ष में उसे प्रयोग में लाने का दावा करने वाला उसका वक्तव्य तथा उसका ंफोन नंबर आदि जो कुछ भी आप देख रहे हैं वह सब कुछ ंफंर्जी हो सकता है। काल सेंटर में काम करने वाले युवक युवतियों की तरह ही ठगी के धंधे में लगी कंपनियां ऐसे साधारण पढ़-लिखे बेराोगार युवकों की बांकायदा भर्ती करती हैं जो समाचार पत्र में किसी उत्पाद के समर्थन में प्रकाशित ंफोन नंबर व नाम की ंफोन काल लेते हैं। उन्हें इस बात की टे्रनिंग दी जाती है कि वे किस प्रकार ंफोन कर्ता को यह बताकर संतुष्ट करें कि अमुक दवाई या उत्पाद बिल्कुल सटीक,ंफायदेमंद तथा तुरंत परिणाम देने वाला है। और इसी झांसे में आकर कोई भी सीधा-सादा परेशान हाल ग्राहक मजबूरी में इनका शिकार हो जाता है और यदि मामला सेक्स अथवा गुप्त रोग संबंधी हो फिर तो वह ग्राहक शर्म के मारे किसी से कुछ बताने अथवा शिकायत करने योग्य भी नहीं रह जाता।

            लिहांजा जनता को चाहिए कि वह ऐसे ंफंर्जी विज्ञापनों के झांसे में हरगिंज न आएं। आज ऐसे धंधों को संचालित करने वाले लोग सैकड़ों करोड़ की संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं जबकि देश का आम आदमी मंहगाई के बोझ तले निरंतर दबता जा रहा है। और दुर्भागयवश यही आम आदमी ठगी का नेटवर्क चलाने वाले सरगनाओं के निशाने पर भी है।

                                                                                                निर्मल रानी                                                                 

 

म.प्र. श्रमजीवी पत्रकार संघ द्वारा रेल मंत्री को बधाई एवं धन्‍यवाद ज्ञापित

म.प्र. श्रमजीवी पत्रकार संघ द्वारा रेल मंत्री को बधाई  एवं धन्‍यवाद ज्ञापित

ग्वालियर। रेल मंत्री ममता बनर्जी द्वारा अधिमान्य पत्रकारों के बच्चों को भी रेल यात्रा टिकट में 50 प्रतिशत की छूट दिए जाने पर मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ ने हर्ष व्यक्त कर रेल मंत्री को बधाई दी है।

संघ के प्रांतीय संयुक्त सचिव विनय अग्रवाल, संभागीय अध्यक्ष सुरेश  शर्मा, संभागीय महासचिव प्रवीण मिश्रा ने बताया कि पूर्व में मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ ने रेल मंत्री ममता बनर्जी को ज्ञापन भेजा था जिसमें मांग की गई थी अधिमान्य पत्रकारों क ो पत्नी  के साथ उनके बच्चों को भी वर्ष में एक बार रेल यात्रा टिकट में 50 प्रतिशत की छूट दिए जाने की मांग की गई थी। इस मांग को रेल मंत्री ने स्वीकार कर नए बजट में इसकी घोषणा कर दी है।

हर्ष व्यक्त करने वालों में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सुरेश सम्राट, नरेन्‍द्र सिंह तोमर '' आनंद'', राजकुमार दुबे, दिवाकर शर्मा, अतर सिंह डण्‍डोतिया, असलम खान, अनिल तोमर, शिवप्रताप सिंह जादौन, उपेन्‍द्र गौतम,  रविन्द्र झारखरिया, डीके जैन, रमेश राजपूत, प्रफुल्ल नायक, उमेश सिंह, गुरुशरण सिंह,  प्रदीप बोहरे, संघ जिलाध्यक्ष श्याम पाठक, महासचिव रविकांत दुबे, अनिल पटेरिया, संतोष जैन, मनीष शर्मा, रामकिशन कटारे, रमन पोपली, ऋषिकेश उपाध्याय, महासचिव हेतु रविकांत दुबे, सचिव हेतु फूलचंद मीणा, हरीश चन्द्रा, चंद्रेश गर्ग, जितेन्द्र साहू, सतीश शाक्यवार, सह सचिव भूपेन्द्र माथुर, गजेन्द्र शिवहरे,  अनिल शिवहरे, अनूप भार्गव, कोषाध्यक्ष अजय मिश्रा, अंकित सिंघल, केके सोनी, संतोष गुप्ता, रामेन्द्र परिहार, धर्मेन्द्र तोमर, भुवनेश तोमर, महेश झा, संजय तोमर, विष्णु अग्रवाल, सुकांत सोनी, धीरज बंसल, एसपीएस चंदेल, नरेन्द्र परिहार, अनुराग चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र तलेगांवकर, संजय तोमर, परेश मिश्रा, संजय त्रिपाठी, सुमन सिंह सिकरवार, प्रदीप गर्ग, विधि सलाहकार पूरन सिंह भदौरिया, राज दुबे, श्याम नरेश, वरुण दुबे, अनिल जाटव आदि शामिल हैं।