बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

ई गवर्नेन्स और वेब पत्रकारिता पर एडवांस इण्टरनेट प्रशिक्षण मुरैना में होगा

ई गवर्नेन्स और वेब पत्रकारिता पर एडवांस इण्टरनेट प्रशिक्षण मुरैना में होगा

मुरैना 17 फरवरी 09/ सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत संस्था नेशनल नोबल यूथ अकादमी द्वारा मुरैना में आगामी अप्रेल माह से एडवांस्ड इण्टरनेट प्रौद्योगिकी और ई गवर्नेन्स तथा ई व्यवसाय व ई रोजगार पर आधारित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किया जा रहा है ।

       वेब सेवाओं की विशिष्ट उपलब्धियों और अनुभवों को प्रख्यात इण्टर नेट विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षणार्थीयों के साथ शेयर किया जायेगा । प्रशिक्षण उपरान्त कुछ पाठयक्रमों के लिए भारत सरकार द्वारा आयोजित परीक्षा देकर भारत सरकार का प्रमाण पत्र प्राप्त किया जा सकेगा । प्रशिक्षण में विद्यार्थी , बेरोजगार, सरकारी कर्मचारी और पत्रकार साहित्यकार तथा इण्टरनेट व्यावसायी शामिल हो सकेंगे । संचालित होने जा रहे कायर्क्रम में एडवांस इण्टरनेट , वेब पत्रकारिता और साहित्यकारिता, वेब डिजाइनिंग तथा कामन सर्विस सेण्टर व ई गुमटी संचालन, इण्टरनेट आपरेशन्स ई गवर्नेन्स एवं सामुदायिक सेवायें आदि प्रमुख है । प्रशिक्षण के इच्छुक युवा 28 फरवरी तक तथा विलम्ब शुल्क सहित 15 मार्च तक नेशनल नोबल यूथ अकादमी के गांधी कालोनी स्थिति कार्यालय पर संपर्क कर सकते है ।

       यह प्रशिक्षण अपने प्रकार का पहला प्रशिक्षण होगा जिसमें वेब सर्वर के संचालक और वेब डिजायनर सीधे ही प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण देंगे ।

 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

सपना 85 का, आस कम्‍प्‍यूटर की, कहर बिजली का, चैलेन्‍ज मामा का

हास्‍य/ व्‍यंग्‍य

सपना 85 का, आस कम्‍प्‍यूटर की, कहर बिजली का, चैलेन्‍ज मामा का

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

जगत मामू यानि जग मामा भनजों से बोले चलो बच्‍चो एक खेल खेलते हैं । जो जीतेगा वो एक क्‍म्‍प्‍यूटर पावेगा 500 रू. वाला इनाम में । हारा तो ठेंगा ।

बच्‍चे बोले वाह मामू क्‍या धांसू आइडिया है, हर्र लगे न फिटकरी रंग चोख आ जायेगा, केन्‍द्र सरकार नये नये आइटम निकाले है, ओर मामू अपनी सील उसी पे ठोक के मेड इन मामूज फैक्‍ट्री ठोक देवे है । खैर अब दान की बछिया के दॉंत तो नहीं देखे जावें हैं । फोकट में मिले तो 500 वाला भी चलेगा । मामू कौन कम उस्‍ताद थे, अपने पावर की मेन चाबी नीचे डाली और उड़ा दी बिजली, ससुरी रात गोल पूरी दिन भर गोल देखें भानजे कैसे अब लाओगे 85 परसेण्‍ट, नहीं लाये तो ठेंगा ।

बच्‍चों को टेंशन, सारी रात टेंशन सारा दिन टेंशन । अब मामू ने इनाम भी रख दी बत्‍ती भी गोल कर दी । अब पचासी तो का पास होइवे के लाले पड़ रहे हैं । आखिर एक भानजा तैश में आ ही गया उसने टी.वी पर एडवर्टाइज देखा, अमिताभ बच्‍चन चाचू बोल कि टेंशन गया पेंशन लेने, भानजा चाचू के डायलॉग पे प्ररित हो गया । और एक अखबार में छपी खबर के मामू को चिठ्ठी लिखो तो मामू बुला लेता है सो लिख डाली फटाफट एक पत्री मामा के नाम । बच्‍चे ने जो लिखा

प्‍यारे मामू जान, तुम पर बिजली कुर्बान ।

बड़े दिनों से कोई नई इनामो इकराम नहीं आ रही थी न कोई पंचायत फंचायत नहीं हो रही थी सो लग ही नहीं रहा था कि मामू की सरकार लौट आयी है । न पत्‍थर गाड़ कर कब्रिस्‍तान बनाये जा रहे थे और न साइकिल से पेट्रोल बचाने मामू दफ्तर जा रहे थे, न कहीं भुक्‍खड़ सम्‍मेलन करा कर अनाज बांटे जा रहे थे, न कोई यात्रा फात्रा का टोटका हो रहा था । हमें लग रहा था मामू गद्दी पे जाके हमें भूल गये, बिसरा गये ।

पर मामू कमाल कर दिया अपने बिजी टैम में से थोड़ा बखत भानजों के लिये निकाल कर उन्‍हें 500 रू वाला ही सही कम्‍प्‍यूटर दे डालने का खेल खेलने का हम भानजों के साथ बढि़या फनी गेम शो चालू कर डाला और ठेले रिक्‍शे वालों को भी सरकारी हलवा का जलवा खिला दिया, हॉं अब कुछ कुछ यकीन हुआ कि मामू जान ही हैं, लौट कर सत्‍ता में आये हैं, जमूड़े बनाने और तमाशा दिखाना चालू कर दिये हैं । थैंक्‍यू मामा जी ।

मामा आपकी शर्त 85 परसेण्‍ट से ऊपर लाने की थी, पर मामू मैं और मेरे सारे दोस्‍त आपकी क्राइटिरिया एल.ओ.सी. से आउट हो गये हैं, अब हम 85 तो क्‍या पास ही हो लें तो आपकी दया से बहुत होगा । हमारे यहॉं सारी रात बिजली नहीं रहवे है, सारे दिन भी अँधेरा छाया है, मोमबत्तियां खरीद खरीद कर पागल हो गये हैं, मम्‍मी पापा की जेब भी जवाब दे गयी है, एक मोमबत्‍ती आधा पौन घण्‍टे संग देती है और बिजली सारी रात गुल रहती है, सारा दिन गुल रहती है, अबकी बार गणित में ऐसे ही सवाल पूछोगे तो शायद हम पास भी हो जायें जैसे एक मोमबत्‍ती 40 मिनिट तक जलती है जिसका दाम 2 रू है और बिजली 23 घण्‍टे गुल रहती है तो बताओ कि एक दिन में कितनी मोमबत्तियां लगेंगीं और एक दिन का खर्च कितना आयेगा । मामू जान ऐसे सवाल हमें अब खूब रट गये हैं, हम फटाक से सवाल का उत्‍तर दे देंगें, कोर्स के सवाल तो मामू अब पढ़ नही पाते सो मामू ऐसे सवाल पूछ कर ही हमारा बेड़ा पार करा देना नहीं तो मामू हम सारे के सारे ही फेल हो जायेंगें ।

मामू अब कम्‍प्‍यूटर तो हमारी पकड़ से निकल गया आपका चैलेन्‍ज कि बेटा बिना बिजली के लाओ 85 परसेण्‍ट और पाओ कम्‍प्‍यूटर, ये हमारे बूते का नहीं है । आपका चैलेन्‍ज हम वापस करते हैं, अब तो पास ही हो लें तो साल बच जायेगा वरना मामू आपका ये गेम शो हम गॉंव शहर के गरीब बच्‍चों की कूबत से बाहर है ।

मामू थोड़ा लिखा, बहुत समझना । आपका प्‍यारा भानजा अपने कई साथियों के साथ ।

मामू को चिठ्ठी मिली तो मामू ने भानजे को बुलवा भेजा और भानजे से कहा कि देखो बेटा, बिजली ने गरीब मोमबत्तियां बनाने वालों की रोजी रोटी छीन ली, हमने उन्‍हें रोजगार मुहैया कराया, गरीब इन्‍वर्टर और बैट्री वालों को धन्‍धा दिलाया । ऊर्जा की खपत और बचत पर अब तुम्‍हें निबन्‍ध नहीं रटने पड़ेंगें । भ्रष्‍टाचार खतम करने आ रहे कम्‍प्‍यूटर और आई.टी. तथा ई गवर्नेन्‍स हमने एक ही वार से बिजली काट कर मामला ही जड़ मेख से मिटा दिया ससुरी न बिजली न आई.टी. न कम्‍प्‍यूटर न पचासी परसेण्‍ट हमने एक झटके में सबके टेंशन दूर कर दिये । भ्रष्‍टाचार खतम हुआ तो देश में ग्‍लोबल मन्‍दी छा जायेगी, सरकार की और सरकारी कारिन्‍दों की कमाई ही ठप्‍प हो जायेगी । सब टेंशनों की जड़ ये बिजली थी । हमने बिजली काट दी सारे टेंशन खतम कर दिये । तुमने कहावत तो सुनी ही होगी कि न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी सो प्रिय भानजे न बिजली होगी न भ्रष्‍टाचार खतम होगा, न आई.टी. आवेगी न कम्‍प्‍यूटर, हमने भयमुक्‍त म.प्र. का वायदा किया था हमारे सरकारी कर्मचारी सबसे ज्‍यादा भयभीत पारदर्शिता लागू होने और भ्रष्‍टाचार के खात्‍में से थे हमने उन्‍हें बिजली काट कर भयमुक्‍त कर दिया । रहा बेटा तुम्‍हारे पास और फेल होने की बात । सो चुनाव परिणामों की तरह हमने परीक्षा परिणाम भी सैटल कर लिये हैं । कहॉं कौन पास होगा और कौन फेल, कौन पच्‍चासी लायेगा कौन ज्‍यादा लायेगा कौन कम्‍प्‍यूटर पावेगा कौन इस गेम शो में हारेगा और किसको ठेंगा मिलेगा सब कुछ सैटल्‍ड है बेटा जा अब घर जा और चद्दर तान कर टॉंग पसार कर सो तेरे 85 से ऊपर आ जायेंगें तू चिन्‍ता मत कर । तुझे कम्‍प्‍यूटर मिल जावेगा । अब ज्‍यादा भभ्‍भर मचा कर हमारी गेम शो की ऐसी तैसी मत कर ।

भनजा बोला कि पर क्‍या मामू ये गलत नहं होगा । मामू बाले कि बेटा देश में ये रोज ही हो रहा है । हर गेम शो में हो रहा था लो जमूड़े बन रहे हैं, मदारी जमूड़े बना रहे हैं, मैं तो केवल उनके चरण चिह्नों की धूलमात्र ही ले रहा हूँ ।

भानजा खुशी खुशी बिना पढ़े लिखे ही कम्‍प्‍यूटर मिलने के सपने लेकर अपने घर लौट आया ।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

चंबल में डकैतों ने जगजीवन सहित आमद दी

मुरैना 7 फरवरी 09, चंबल के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों अचानक कई चोरों और डकैतों ने धावा बोल दिया है ।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में चोरी की घटनाओं में अचानक बेतहाशा वृद्धि हो गयी है । अब तक कई किसानों के घरों में चोरीयाँ हो चुकीं हैं साथ ही सैकडों गाय और भैंसें भी चोरी से हाँक लीं गयीं हैं । किसानों का कहना है कि पुलिस चोर पकडना तो दूर रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती ।
दूसरी ओर चंबल में अचानक बढी अपहरण और लूट की वारदातों के पीछे नये डकैत गिरोहों की आमद के साथ पुलिस द्वारा मुठभेड में मृत बताये गये डकैत जगजीवन परिहार को कुछ किसानों द्वारा जीवित देखे जाने और वारदातें किये जाने के दावे से अँचल में खौफ और दहशत फैल गयी है । नये डकैत गिरोहों में राजवीर सिंह का गिरोह प्रमुख है । फिलहाल इस गिरोह के निशाने पर बहुजन समाज पार्टी से जुडे हरिजन और ब्राह्मण हैं । सूत्र बताते हैं कि राजवीर सिंह गिरोह इन दिनों अपनी ताकत बढाने में लगा है और चुन चुन कर ऐसे लोगों की मदद कर रहा है जिन्हें राजनीतिक या अन्य कारणों से फर्जी हरिजन एक्ट के केसों में फंसा कर परेशान किया गया है या जिन्हें चोरी चपाटी या लूट करके बसपा कार्यकर्ताऔं ने सताया हो । इस गिरोह की पकड जहाँ दिनोँदिन मजबूत होने की खबर है वहीं जगजीवन परिहार का समर्थन व सहयोग इस गिरोह को मिलने की खबर की भी पुष्टि हुयी है ।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

हास्‍य / व्‍यंग्‍य// का चचा चुनाव लड़बे को मन है का ....चलो एम.पी. आ जाओ चचा

हास्‍य / व्‍यंग्‍य

का चचा चुनाव लड़बे को मन है का ....चलो एम.पी. आ जाओ चचा

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

अब चुनावी चचा का टैम पूरा होइबे का बखत आ गया । जब बखत आ जाता है तो बड़े बड़े बौरा जाते हैं । अर्गल का टैम पूरा हुआ तो वे भी बौरा गये, करोड़ों की करारे नोटो की गडडी संसद में लहरा आये । सोचा कि मुरैना जनरल हो गयी अम्‍बाह असेम्‍बली या भिण्‍ड लोकसभा लायक तो बौरा ही लें । अम्‍बाह में तो काम नहीं बना अब भिण्‍ड लोकसभा की आस में अबई तक बौराये हैं ।

साला फागुन का महीना बड़ा विकट होता है, अच्‍छे अच्‍छे बौरा जाते हैं आम के पेड़ पर तो बाकायदा बौर आ जाता है वह भी बौरा जाता है । मगर नेता लोग और अफसर तो बसन्‍त ऋतु में बौराते हैं,  बौराना इण्डिया की संस्‍कृति है, हर भारतीय जब तक बौराता नहीं, लगता ही नहीं कि वह भारत का बेटा है ।

शेषन साहब भी बौराये थे उन्‍हें भी राजनीतिज्ञों के चुनाव कराते कराते राजनेता बनने और चुनाव लड़ने का चस्‍का लगा था । जिनके फेवर में सब कुछ किया उन्‍हींने उन्‍हें टिकिट नहीं दिया फिर भी पतली गली से चुनावी चचा शेषन ने अपनी हसरत पूरी करने की कोशिशें कीं । अब ये दीगर बात है कि कामयाबी ने कदम नहीं चूमे । वे भी अपने बखत पूरा होते होते खूब बौराये खूब चिल्‍लाये कि मेरा रंग दे बसन्‍ती चोला । पर बसन्‍ती चोला तो क्‍या किसी मुये राजनेता ने उन्‍हें पीला रूमाल तक नहीं दिया ।

अब ये चुनावी अखाड़ा मण्‍डल की गद्दी में ही खोट है तो क्‍या कहिये, जो भी बैठे है, बौरा जावे है । गलत है, कुछ न कुछ तो गद्दी में गड़बड़ है, हमें तो लगे है कि पाकिस्‍तान का हाथ होवे है, जॉंच करवानी चाहिये । अब सुनी है कि चावला साहब का बखत आ रहा है, भईया चावला साहब आप अभी तक ठीक ठाक हो, जरा संभल कर रहना, गद्दी गड़बड़ है कहीं बौरा मत जाना ।

हमारे मुरैना में एक बड़ी दिलचस्‍प बात है कि  आप पिछले तीस बरस का इतिहास देखेंगें तो पायेंगें कि किसी भी प्रायवेट स्‍कूल में जो भी मास्‍टर नौकरी करने गया, और स्‍कूल मालिक की रंगदारी जो देखी वह प्रभावित हो गया और अगले ही सत्र में उसने खुद का स्‍कूल खोल लिया । गोया सिचुयेशन कुछ ऐसी हो गयी कि एक दिन ऐसा आया कि मुरैना के हर अगल और बगल में स्‍कूल कोचिंग हो गये । हमारे कलेक्‍टर साहब महेश कुमार अग्रवाल साहब अभी एक दिन एक कार्यक्रम में बोल रहे थे कि जबलपुर जैसे महानगर में भी शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं में कम लोग निकल पाते हैं मगर मुरैना जैसे छोटे शहर से प्रतिभाओं की ऑंधी तूफान सा निकलता है और केवल तूफान नहीं बल्कि टॉपर्स का शहर कहें तो सही होगा ।

अब कलेक्‍टर साहब इत्‍ता तो समझ ही गये कि चम्‍बल टापर्स की जन्‍मदात्री है मगर इन टापर्स के पीछे गरीबी, संघर्ष और बिना सुविधा साधन पढाई लिखाई करने बिना बिजली, दिये (दीपक) और मोमबत्‍ती से किताबों में ऑंखे फोड़ने का भी एक विकट और पवित्र इतिहास है । खैर असल बात ये है कि अगल बगल और सब बगल में खुले एजुकेशन सेल सेण्‍टर्स पर भी तो नजर डालिये, जो भी एक बार मास्‍टरी कर आया वही अगले सत्र में अपनी खुद की दूकान खोल कर प्रिंसिपल बन गया ।

बस बस चुनावी चचा को भी कुछ ऐसा ही बुखार जान पड़े है, अब बखत पूरा हो रहा है तो फुर्सत में का करेंगें । बहुत लड़ा लिया अब खुद ही लड़ लो । अब चचा जब लड़ने की ठान ही लिये हो तो का पता बसन्‍ती, केसरिया या रंग बिरंगा टिकिट दे कै न दे, ऐसा करो कि चम्‍बल में आ जाओ । यहॉं चुनाव जीतना आसान है । बस थोड़ी सी सेटिंग बिठानी पड़ेगी बस समझ लो निकल गयी सीट केवल तीन बार वोट काउण्टिंग में बिजली कटेगी, और हरी हराई सीट निकल जायेगी । और इलेक्‍शन कमीशन के डिस्‍पले बोर्ड पर शाम तक मनवांछित परिणाम नहीं घोषित होने तक रिजल्‍ट पॉज बने रहेंगें । जब आप विजयी घोषित होकर आपत्ति दाखिल करने का वक्‍त निकल जायेगा तब इलेक्‍शन कमीशन के लाइव डिस्‍पले पर रिजल्‍ट शो होंगें । बकाया तो सारे गुण्‍ताड़े जानते ही हो, मतलब ई.वी.एम. में कैसे गड़बड़ करनी है, डाकमत की गिनती कैसे करानी है, कैसे विरोधी पार्टी के प्रभाव क्षेत्र में ई.वी..एम. पर नाम उलट पुलट पर्ची लगानी है । बटन में करण्‍ट की खबर फैलाना वगैरह वगैरह, कैसे वोटर्स की कुल संख्‍या से ज्‍यादा वोट ई.वी.एम. में से निकलने है । अरे चचा उस्‍ताद हो यार तुम्‍हें का बताये । चलो आ जाओ चम्‍बल में सीट निकलवा देंगें । पक्‍का एकदम सौ टके पक्‍का । 

 

शनिवार, 24 जनवरी 2009

24 घंटे के दरम्याँ 18 घंटे कटी बिजली...

मुरैना 24 जनवरी, क्रुद्ध जनता द्वारा कई बिजलीघरों में तोडफोड और आगजनी की घटनाओं के बाद भी चंबल की बिजली सप्लाई में कोई सुधार नहीं आया है । ज्ञातव्य है कि इस समय चंबल के शहरी क्षेत्रों में प्रातः 5 बजे से सायँ 4 बजे तक फिर सायँ 7 बजे से रात 8 बजे तक और ग्रामीण क्षेत्रों में वैसे तो 65 फीसदी गाँवों में बिजली है ही नहीं लेकिन जहाँ है वहाँ दो या तीन दिन बाद ही दो या तीन घंटे ही बिजली पहुँचती है ।
बिके अखबार, अधिकारीयों की तारीफ में फर्जी कशीदे
समाचार पत्रों को विज्ञापनों का लालच रहता है यह जगजाहिर है और इस पर ग्वालियर में संपन्न पत्रकारों की कार्यशाला में अखबारों की काफी छीछालेदर हो चुकी है । लेकिन अब जो सड.कों पर बात है वह पत्रकारिता के लिये शायद सबसे शर्मनाक और कलंक्य है कि अधिकारीयों से साप्ताहिक हफ्ता वसूली । अभी तक पत्रकार अधिकारीयों से मासिक वसूली करते थे तो चलो बात ठीक थी आखिर पत्रकारों की बीवीयों को भी लाली लिपिस्टक चाहिये होती थी लेकिन अब हफ्ता वसूली तक डाउनफाल का भी कारण है कि कुछ समाजसेवी बंधु बीवीयों के इतर और भी कई लैलाऔं के फेर में मजनूं के रोल में हैं तो लैला के लिये भी लाली लिपिस्टक चाहिये कि नहीं । सो भईया अब मासिक से साप्ताहिक तक तो आना ही था न ।
अखबार लिखता है कि (इन प्रायोजित खबरों के लिये कित्ता पा गये ये तो वही बता सकते हैं, वैसे हमें पता है) लोग हीटर जलाते हैं सो लाइन लाँसेस होता है (मित्रो जो इँजिनियरिंग के छात्र रहे हों वे जानते हैं कि लाइन लास दर असल फीडेड इनपुट और रिसीव्ड या गैन्ड आउटपुट में अंतर अर्थात बीच रास्ते में गुम हुयी ऊर्जा के अर्थ हेतु प्रयुक्त होता है, जिसमें लीकेज, लूज जंपर्स के कारण हीट कन्वर्जन में व्यय फालतू ऊर्जा आदि आती हैं) लेकिन हमारे पत्रकार महोदय ने लाइन लासेस की नयी डेफिनेशन रच दी है, उनके मुताबिक अब रिसीव्ड आउटपुट का उपभोक्ता द्वारा उपयोग करना भी लाइन लासेस हैं । मुझे लगता है कि इंजीनियरिंग छात्र अब तक जो पढते आ रहे हैं सरासर गलत पढते रहे हैं, हमारे पत्रकार महोदय की नवरचित डेफिनेशन उन्हें पढाई जाना चाहिये यानि कोर्स काँटेण्ट बदलना चाहिये और हमारे पत्रकार महोदय को इसे पढाने के लिये हेड आँफ न्यू डेफिनेशन्स नियुक्त कर देना चाहिये । वैसे एक मुकम्मल बात ये है हे बिक चुके दोस्त कि हीटर तो आज कडाके की ठंड और बर्फीले कोहरे के कारण इक्के दुक्का लोग जला रहे हैं, लेकिन पिछले चार साल में भरी गर्मी सहित साल का एक वो दिन तो बता दे जिस दिन बिजली कटोती नहीं हुयी हो और तसल्ली से जनता को बिजली मिली हो । हाँ मेरे बिके अखबार के बिके पत्रकार आपकी जनरल नालेज में थोडा इजाफा और कर दें , भोपाल शहर पूर्णतः बिजली कटोती मुक्त है वहाँ तो हीटर नामक जंतु का आपके अनुसार होगा ही नहीं । न वहाँ लाइन लाँस होगा न बिजली चोरी होती होगी । खैर राम राज है भाई । लिखे जाओ अर्जी फर्जी प्रायोजित । जय हिन्द जय भारत ।।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

ई शासन- सवालों व संभावनाओं और घने बादलों के पीछे चमकता भारत का भविष्‍य का सूर्य

ई शासन- सवालों व संभावनाओं और घने बादलों के पीछे चमकता भारत का भविष्‍य का सूर्य

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

किश्‍तबद्ध आलेख भाग-1

भारत में महाराजा विक्रमादित्‍य का साम्राज्‍य रहा हो या कौटिल्‍य चाणक्‍य के समय की शासन प्रणाली रही हो या फिर राजा राम का राम राज्‍य हो सभी ऐतिहासिक तथ्‍य कम से कम भारत में एक सर्वोत्‍तम सुशासन प्रणाली के पूर्व से अवस्थित रहने की ओर ही संकेत करते हैं ।

सुशासन, पारदर्शिता, न्‍यायप्रियता और दूध का दूध और पानी का पानी, सत्‍यवादिता, निष्‍पक्ष कर्म जैसी मूल बातें भारत की आत्‍मायें हैं और इनके बगैर भारतवर्ष की कल्‍पना असंभव है ।

कोई कितना भी झुठलाये और कितना भी बल और छल के साथ सम्‍पूर्ण ताकतवर होकर भारत की इन मूल भावनाओं को धक्‍का देकर कितना भी भ्रष्‍टाचार फैलाता फिरे या जानकारीयों व सूचनाओं को अपारदर्शी बना कर पारदर्शिता पर कुहासा फैलाये कितना भी अन्‍याय की शक्ति का महिमा बखान करता फिरे अंतत: उसे मात ही खानी पड़ेगी । सत्‍य, न्‍यायप्रियता और सुशासन, ईमानदारी, परहितवाद आतिथ्‍य जैसी परम्‍परायें व संस्‍कार भारत की आत्‍मा में ही केवल नहीं रचते बसते अपितु रग रग में विद्यमान हैं ।

भारत में लंकाधीश रावण का भी साम्राज्‍य का भी इतिहास है तो कंस के अत्‍याचारों की कथायें भी विद्यमान हैं, दुर्योधन के अन्‍यायी कृत्‍यों की कथाओं से भारत का इतिहास भरा है तो कहीं आल्‍हा जैसे महाकाव्‍य में छल कपट और कूटनीति जैसे दुश्‍चारित्रिक उपाख्‍यान भरे हैं तो इन्‍हीं के साथ हमारा विलक्षण व अद्वितीय इतिहास सत्‍य की असत्‍य पर विजय, अन्‍याय पर न्‍याय का अंतत: साम्राज्‍य, कुशासन पर सुशासन का राज्‍य, राम की रावण पर विजय, कृष्‍ण की कंस पर विजय, पाण्‍डवों की कौरवों पर विजय, आल्‍हा, ऊदल, मलखान, इंदल जैसे वीरों की विजय कथायें भी भारत की असल आत्‍मा का ही बोध करातीं हैं । भारत में अँधेरे के राज, असत्‍य के साम्राज्‍य और अन्‍याय की आंधीयाँ आते जाते रहे हैं इनसे प्रकाश, सत्‍य और न्‍याय का युद्ध युगों से चला आ रहा है, वे भी युग युग में प्रकट हुये तो वे भी हर युग में आये । यानि दोनों शक्तियों का अस्तित्‍व और संघर्ष भारत में युगों से होता आया है । बस राक्षस और दैत्‍य अपने नाम और रूप बदल बदल कर आते रहे इसी प्रकार राम और कृष्‍ण भी इनसे लड़ने हर युग में नाम और रूप बदल बदल कर आते रहे ।

वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में दैत्‍यों और राक्षसों ने कुशासन, भ्रष्‍टाचार और अन्‍याय अत्‍याचार के रूप में अपना राज कायम किया है और अपारदर्शिता के मायाजाल में अपने पापों को ढंकने के बेहतरीन इंतजामात के साथ ताकि लम्‍बे समय तक इनके पापों और कुकर्मों के भेद न खुल सकें ।

ई शासन और कुशासन का युद्ध

जैसा कि ऊपर दृष्‍टान्‍तात्‍मक विवरण से इतना तो स्‍पष्‍ट हो ही गया होगा कि सतयुग, त्रेता और द्वापर युग के दैत्‍यों और राक्षसों ने कलयुग में कई रूपों में जन्‍म ले लिया है और निरीह जनता यानि आम आदमी को सताने और उसका रक्‍त पीने व चूसने का काम करने इन ताकतों का अंदाज और स्‍टायल भी नया और आधुनिक यानि मायावी है या‍नि कहीं भ्रष्‍टासुर दो रूपये से लेकर करोड़ों तक के भ्रष्‍टाचार से जनता का लहू चूसने में लगा है तो कहीं कहीं आतंकासुर और बमासुर जगह जगह खून की नदियॉं बहातें फिर रहे हैं, कहीं दूसरी जगह इनका अवतार अन्‍यायासुर के रूप में हुआ है जो फर्जी केसों में लोगों को फंसाने से लेकर फांसी के फन्‍दे से हलाल करने में या जेल में सड़ा सड़ा कर कष्‍ट पीड़ा देने के कारोबार में लगे हैं ।

कहीं तो ठेकासुर चन्‍द चॉंदी के सिक्‍कों के लिये या घर परिवारी भाई भतीजों के कल्‍याण के लिये ठेके बांटने में लगे हैं । कही कहीं दैत्‍यराजों के अवतार बकासुरों यानि बक बक कर भाषण झाड़ू फर्जी खोखले वादासुर नेताओं के रूप में जनम पड़े हैं । कुल मिला कर आप अपने आप को कहीं बलात्‍कासुर तो कहीं भ्रष्‍टासुर या अफवाहासुर किसी न किसी असुर से घिरा पायेंगें कहीं चुगली करते चुगलासुर तो कहीं भ्रष्‍टाचार कर अपारदर्शिता की आड़ में खाये पीये को हजम करते जुगाली करते डकारासुर नजर आयेंगें । इन चौतरफा असुरों की भीड़ के बीच भी आम आदमी जिन्‍दा है, भारत जिन्‍दा है यह हैरत की बात है, विलक्षण बात है ।

विलक्षण के साथ हैरत अंगेज यह भी है कि एक भ्रष्‍टासुर दूसरे भ्रष्‍टाचारासुर का वक्‍त पड़ने पर खून पीने से बाज नहीं आता । यानि सिपाही भी टी.आई. से रिश्‍वत पा जाता है ।

फिर भी भारत जिन्‍दा है हैरत अंगेज है, भारतवासी जिन्‍दा हैं करिश्‍मा है । फिर भी भारत लड़ रहा है यह काबिले तारीफ है । आखिर क्‍यों न हो श्रीकृष्‍ण ने कहा कि '' यदा यदा हि धर्मस्‍य ग्‍लानिर्भवति भारत........संभवामि युगे युगे ''

खैर श्रीकृष्‍ण तो फिलहाल आने से रहे आखिर आई.पी.सी. (भारतीय दण्‍ड संहिता) की पूरी 511 धारा श्रीकृष्‍ण पर लागू होती हैं । श्रीकृष्‍ण ने जो भी किया आई.पी.सी. में वह अपराध है, श्रीकृष्‍ण की श्रीमद्भागवत या हरिवंश पुराण या महाभारत उनके अपराधों का साक्ष्‍य प्रमाण संग्रह यानि अपराध शास्‍त्र है और अंग्रेजों ने सन 1860 में आई.पी.सी. बना डाली कि श्रीकृष्‍ण और उसकी विचारधारा को ब्‍लॉक करिये, क्‍योंकि उस समय देश में जितना भी क्रान्तिकारी पैदा हो रहा था, सबके सब श्रीकृष्‍ण की गीता पढ़ कर आ रहे थे और क्रान्ति, आजादी के नाम पर बगावत का झण्‍डा उठा लेते थे । अँग्रेजो के लिये श्रीकृष्‍ण को रोकना जरूरी था, श्रीकृष्‍ण की विचारधारा पर लगाम लगाना जरूरी था (श्रीकृष्‍ण की विचार धारा घोड़ा नहीं है भईये पर का करिये ये हमारी बोलचाल और बात समझाने का लहजा है भईये म.प्र. के भ्रष्‍टासुर कर्मचारीगण नोट करें, भईया हम अपने शब्‍द वापस नहीं लिया करते ) सो अँग्रेज आई.पी.सी. रच लाये, श्रीकृष्‍ण का अवतार प्रतिबंधित हो गया और यदा यदा हि धर्मस्‍य सदा के लिये ब्‍लॉक हो गया । चलो अँग्रेज भईयों को ये करना था ये उनकी मजबूरी थी लेकिन । श्रीकृष्‍ण को हम आज तलक राके हैं, उसे अवतार नहीं लेने दे रहे आज तक अँग्रेजों की बनाई आई.पी.सी. सन 1860 से देश चला रहे हैं । आजादी के 62 साल बाद भी अँग्रेजों के कानून से देश चला रहे हैं, हमारे पास कानून के नाम पर अँग्रेजों की सड़ी रद्दी कानूनी किताबों को उलटपुलट कर धूल झड़ाने (संशोधन) का काम केवल बचा है । अब सवाल ये है, कि फिर हम आजादी की लड़ाई किससे लड़ रहे थे अँग्रेजो से या अँगेजों की नीतियों व कानूनों के खिलाफ । अगर उनके कानून ठीक ठाक थे तो फिर अँग्रेजों को यहॉं से विदा करने की जरूरत ही क्‍या थी । जित्‍ते मुठ्ठी भर संशोधन हमने 62 साल में रचे उससे ज्‍यादा तो अँगेज केवल एक चार्टर से या एक नये कानून से कर देते । क्‍या सच में हम आजाद हो गये । हॉं हम आजाद हो गये लेकिन विरासत को सहेजे हैं, कानूनों के रूप में भी, वे भी देश में कृष्‍ण को जन्‍म नहीं लेने देना चाहते थे हम भी 62 साल से नहीं लेने दे रहे । हममें और अँग्रेजों में फर्क क्‍या है । यानि यहॉं भी कहीं न कहीं अंधकासुर छिपा बैठा है ।

खैर आप सोचिये अब ई शासन और सुशासन पर लिखना ही है तो यह आलेख किश्‍तबद्ध रूप में चलेगा आप तब तक इतने पर विचार करिये मैं दूसरी किश्‍त की तैयारी करता हूँ । इस आलेख के साथ आप मानसिक तैयारी व आत्मिक तैयारी के साथ मेरे साथ भारत में सुशासन या ई शासन लाने को तैयार रहिये मैं आपको बताऊंगा कि क्‍यों नहीं आ पा रहा सुशासन और क्‍यों नहीं लागू हो पा रहा ई शासन । लेकिन यदि हर भारतवासी ने यदि ठान लिया कि नहीं नहीं बस बहुत हो लिया अब तो सुशासन होना ही चाहिये, तो मैं कहता हूँ कि यह बहुत आसान है और महज हमसे चन्‍द कदम भर यह दूर है तथा केवल चन्‍द पलों की बात है ।    क्रमश: अगले अंक में जारी .............

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

मुरैना बिजली सप्लाई में आंशिक सुधार

मुरैना 08 जनवरी 09 । आखिर कष्टदायी अँधाधुँध बिजली कटौती से मुरैना की जनता को आँशिक राहत मिल गयी है ! हाँलाँकि सुबह 5 बजे से सुबह 10 बजे तक होने वाली बिजली कटौती से अभी तक छुटकारा नहीं मिला है । जिससे परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र और पानी भरने के लिये लोग खासे परेशान हैं !